फर्जी इंटरनेशनल कॉल सेंटर के मामले में एसटीएफ ने जब कागजों की पड़ताल की तो कुछ देर बाद खुद को ठेले पर खड़ा पाया। विदेशियों को ठगने वाले इन शातिरों ने इस बिल्डिंग का किरायानामा भी एक ठेले वाले के नाम पर कराया हुआ था। एसटीएफ इसी नाम को खोजते हुए व्यक्ति तक पहुंची तो पता चला कि ठेला चलाता है और धोखे में रखकर उससे दस्तावेज लिए गए थे।
उसे तो पता ही नहीं कि उसके नाम पर कोई बिल्डिंग किराये पर भी ली गई है। इस मामले में एसटीएफ के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसके मास्टरमाइंड को खोजने की है। इसके लिए एसटीएफ कड़ियों से कड़ियां जोड़ने की कोशिश तो कर रही, लेकिन सफलता नहीं मिल रही है। कारण है कि नीचे के कर्मचारियों को अपने सुपरवाइजर का नाम पता है और सुपरवाइजर अपने मैनेजर का नाम जानता है। हद तो तब हुई जब मैनेजर से पूछा गया तो वह मालिक का नाम तक नहीं बता सका। सख्ती से भी पूछताछ की गई, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।
तीन लोगों के नाम जैसे-तैसे सामने आए, लेकिन इनका किसी को मोबाइल नंबर भी नहीं पता। पता सिर्फ मेरठ और दिल्ली है। हालांकि, इस बीच इन तीनों में से दो के पते तो खोज लिए गए हैं, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया है। एसटीएफ के अधिकारियों की माने तो यदि कड़ियां जुड़ी तो कई अन्य लोगों के नाम भी सामने आ सकते हैं। अभी तक पुलिस को सिर्फ बाहरी लोगों के नाम ही पता हैं। बताया जा रहा कि इसके अंदर तक कुछ सफेदपोश लोग भी हो सकते हैं। हालांकि, इन सबका पता तो जांच के बाद ही चलेगा।
अधिकतर पैसा कोड में, खातों की पड़ताल भी नहीं
असली लोगों तक बैंक खातों से भी नहीं पहुंचा जा सकता है। इसका कारण है कि ज्यादातर पैसा क्यूआर कोड के माध्यम से आया है और यह कोड कुछ देर में खुद डिलीट हो जाता है। यही नहीं करोड़ों रुपये तो गिफ्ट कार्ड के माध्यम से आया है। इसके लिए बहुत से वर्चुअल अकाउंट भी बनाए गए हैं। एसटीएफ के अधिकारियों की माने तो इन्हें ट्रेस करना बेहद मुश्किल होता है। साफ है कि बैंक खातों में रकम गई नहीं, तो ट्रेस कहां से होंगे।
अपराधी भी है, पुलिस भी है, लेकिन पीड़ित नहीं है। जुल्म किस पर हुआ यह बताने वाला भी कोई नहीं है। कॉल सेंटर वाले मामलों में सबसे बड़ी समस्या यही है कि पुलिस ने कार्रवाई तो की, लेकिन कोर्ट में न्याय किसे दिलाएं।
यही कारण है कि विवेचना के बाद चार्जशीट दाखिल करने में विवेचना अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं। किसी भी अपराध में एक अपराधी होता है और दूसरा पीड़ित। तीसरी होती है, पुलिस जो विवेचना कर अदालत को यह बताती है कि वास्तव में पीड़ित पर जुल्म हुआ है। मुकदमे पीड़ित या उसके अभिभावकों की ओर से ही दर्ज कराए जाते हैं, लेकिन इन मामलों में अपराधी (आरोपी) हैं और पुलिस भी है, लेकिन बीच का व्यक्ति पीड़ित नहीं है। पीड़ित हैं तो वह हजारों किमी दूर बैठा है। यही कारण है कि इन मामलों में पुलिस को विवेचना करने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पूर्व के चार मामलों में बमुश्किल चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की गई हैं। मा.सि.रि.
वर्चुअल खाते भी होते हैं विदेशियों के
पहले मामलों में जिन लोगों के वर्चुअल खातों का इस्तेमाल किया गया, वह भी विदेशियों के ही होते हैं। ऐसे में पुलिस के पास कोई ऐसा सिस्टम नहीं कि इन खातों को ट्रेस किया जा सके। पिछले साल एक मामले में एफबीआई ने यहां की पुलिस को लीड दी थी। तब कहीं जाकर कुछ लोगों पर कार्रवाई हो सकी थी। जहां तक ऐसे मामलों में सजा की बात है तो वह भी मुश्किल ही होती है।