मजदूर की बेटी रूपा ने हरिद्वार में एक दिन पहले ही फर्राटा दौड़ की स्टेट चैंपियनशिप जीती है। रूपा की करिश्माई प्रतिभा देखिए कभी भी वह दौड़ का अभ्यास नहीं करती। बस, प्रतियोगिता वाले दिन मजबूत इरादे उसके पांवों में पंख लगा देते हैं। सोचिए, ऐसी असाधारण खेल प्रतिभा को अगर ढंग का शिक्षण-प्रशिक्षण मिले तो वह राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फलक पर क्या कुछ नहीं कर सकती।
डीएम ने दिखाई लाचारी
सिस्टम का हाल देखिए। डीएम लाचारी दिखाते हैं कि प्रशासन रूपा की मदद नहीं कर सकता। खेल अधिकारी का बयान प्रतिभाओं को अपनी अजगरी लपेट में लेने वाले सिस्टम का आईना है जो कहते हैं कि रूपा के लिए प्रशिक्षण और रहने-सहने का इंतजाम तो हो सकता है पर उसके लिए दो बार की स्टेट चैंपियन को ट्रायल देना पड़ेगा। जूनियर हाईस्कूल भकुंडा की कक्षा आठ की छात्रा रूपा दो साल से फर्राटा दौड़ की राज्य चैंपियनशिप जीत रही है। इस साल जीत के तमगे ने सिर्फ पांच सौ रुपये दिलाए हैं। उसका सपना राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीटी ऊषा की मानिंद ट्रैक पर फर्राटा भरने की है। लेकिन इस सपने की ताबीर की राह में बड़े रोड़े हैं।
एक गिलास दूध पिलाने तक को पैसे नहीं
नेपाली मूल के रूपा के पिता दीपक की माली हालत ऐसी है कि उसके लिए एक गिलास दूध तक का इंतजाम नहीं कर सकते। ऐसे में उसे राष्ट्रीय स्तर का धावक बनाने के लिए अंडे, काजू, बादाम मुहैया कराने की तो सोची भी नहीं जा सकती। पिछले साल विद्यालय के शिक्षक अवतार सिंह रावत ने उसे दौड़ के लिए जूते और ट्रैक सूट खरीद कर दिया था। इसे खालिस प्रतिभा और दृढ़ संकल्प का कमाल ही कहिए कि उसने राज्य स्तरीय फर्राटा दौड़ की चैंपियनशिप पर अपने नाम की मुहर लगा दी। इसके अलावा उसे किसी ने कोई मदद नहीं की है।
हम नेपाली मजदूरों को कौन जानता है। हमारी बेटी ने हमें पूरे उत्तराखंड में जो सम्मान दिलाया, हम उसके आजीवन ऋणी रहेंगे। बेटी की तरक्की के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। आगे ईश्वर को जो मंजूर होगा। - दीपक और अमृता/ रूपा के पिता-माता
खेल विभाग छात्रा के लिए शिक्षण सत्र 2014/15 से प्रशिक्षण के साथ रहने, खाने की मदद कर सकता है। इसके लिए छात्रा का पहले ट्रायल लिया जाएगा। -दिनेश असवाल जिला खेल अधिकारी चमोली