उत्तराखंड की बेहद खूबसूरत नीति घाटी में अब बादल ऐसे नहीं बरसते जो तन-मन को भिगो दें। हिमालय के हॉट स्पॉट तिब्बती पठार की इस घाटी में अब बादल फटना, तूफान, नदियों का उफनना आम हो गया है।
2013 में धौली गंगा ऐसे उफनाई कि अपने साथ तीन जल विद्युत परियोजनाओं को बहा कर ले गई। यही तिब्बती पठार है, जिसे वाटर टावर ऑफ एशिया, रूफ टॉप ऑफ द वर्ल्ड, थर्ड पोल कहा जाता है। 3500 गुणा 1500 वर्ग किलोमीटर के इस पठार पर एक दर्जन देश पानी, मौसम के संतुलन के लिए निर्भर हैं।
यहां के मौसम में बदलाव बता रहा है कि हिमालय बदल ही नहीं रहा, बल्कि सिसक रहा है। जून 2013 की केदारनाथ आपदा और इसके बाद जम्मू की त्रासदी से इसकी पुष्टि भी हो रही है। भारतीय मौसम विभाग की 2013 की जलवायु परिवर्तन की रिपोर्ट का इशारा भी यही है।
देश में बारिश का सालाना औसत ट्रेंड बता रहा है कि आंध्र प्रदेश, गुजरात, बिहार, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मेघालय, मिजोरम, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु, त्रिपुरा में बरसात में इजाफा हुआ है। अरुणाचल, असम, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक आदि में कमी आई है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में बरसात बेहद अनिश्चित हो गई है। अल निनो के शोर में यह भुला ही दिया गया कि मौसम को हाथ की रेखाओं की तरह पढ़ने वाले किसान अब घाघ की कहावतों पर भी यकीन नहीं कर पा रहे। उत्तराखंड में जून के महीने में केदारनाथ हर रोज दोपहर बाद बर्फबारी की चपेट में है।