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सिसक रहा हिमालय, पर्यावरण दिवस पर एक रिपोर्ट

Fri, 05 Jun 2015 03:42 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड की बेहद खूबसूरत नीति घाटी में अब बादल ऐसे नहीं बरसते जो तन-मन को भिगो दें। हिमालय के हॉट स्पॉट तिब्बती पठार की इस घाटी में अब बादल फटना, तूफान, नदियों का उफनना आम हो गया है।
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2013 में धौली गंगा ऐसे उफनाई कि अपने साथ तीन जल विद्युत परियोजनाओं को बहा कर ले गई। यही तिब्बती पठार है, जिसे वाटर टावर ऑफ एशिया, रूफ टॉप ऑफ द वर्ल्ड, थर्ड पोल कहा जाता है। 3500 गुणा 1500 वर्ग किलोमीटर के इस पठार पर एक दर्जन देश पानी, मौसम के संतुलन के लिए निर्भर हैं।

यहां के मौसम में बदलाव बता रहा है कि हिमालय बदल ही नहीं रहा, बल्कि सिसक रहा है। जून 2013 की केदारनाथ आपदा और इसके बाद जम्मू की त्रासदी से इसकी पुष्टि भी हो रही है। भारतीय मौसम विभाग की 2013 की जलवायु परिवर्तन की रिपोर्ट का इशारा भी यही है।
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देश में बारिश का सालाना औसत ट्रेंड बता रहा है कि आंध्र प्रदेश, गुजरात, बिहार, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मेघालय, मिजोरम, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु, त्रिपुरा में बरसात में इजाफा हुआ है। अरुणाचल, असम, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक आदि में कमी आई है।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में बरसात बेहद अनिश्चित हो गई है। अल निनो के शोर में यह भुला ही दिया गया कि मौसम को हाथ की रेखाओं की तरह पढ़ने वाले किसान अब घाघ की कहावतों पर भी यकीन नहीं कर पा रहे। उत्तराखंड में जून के महीने में केदारनाथ हर रोज दोपहर बाद बर्फबारी की चपेट में है।
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2010 से पहले सूखे की चपेट में आया था उत्तराखंड

मामला सिर्फ एक साल सामान्य से कम बरसात का नहीं रह गया है। उत्तराखंड में 2010-11 में प्रदेश में भारी बरसात के कारण 14 हजार किलोमीटर सड़क ध्वस्त हो गई थी। केदारनाथ की आपदा 17 जून की है। यह तबाही ऐसे महीने में आई जब इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर पाया था। 2010 से पहले उत्तराखंड सूखे की चपेट में आया था।

पर्यावरण के प्रहरी माने जाने वाले जंगल भी चिंता का सबब बने हुए हैं। फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की 2013 की रिपोर्ट बता रही है कि उत्तराखंड सहित बिहार, गुजरात, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, केरला, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, उत्तर प्रदेश आदि में वनाच्छादित क्षेत्र में इजाफा हुआ है।

2011 के मुकाबले आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि में वनाच्छादित क्षेत्र घटा है। कुल मिलाकर 5871 वर्ग किलोमीटर का इजाफा पूरे देश में रिकार्ड किया गया। सघन वन क्षेत्र 83471 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 83502 वर्ग किलोमीटर हो गया हो पर मध्यम सघन वन क्षेत्र 320736 वर्ग किलोमीटर से घटकर 318745 वर्ग किलोमीटर रह गया।

करीब दो हजार वर्ग किलोमीटर की यह कमी बता रही है कि कंक्रीट का जंगल तेजी से बढ़ रहा है। 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में शहरी आबादी 28.31 प्रतिशत थी जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 31.16 प्रतिशत हो गई।

इससे पहले 1991 मेंदेश में शहरी आबादी 11 प्रतिशत के आसपास थी। शहरीकरण की यह रफ्तार अपने साथ घर, दुकान, मॉल, पक्की सड़कों का जाल लेकर आ रही है, जो आखिरकार हरे पेड़ों पर ही भारी पड़ रही है।
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शहरीकरण की बढ़ती रफ्तार चिंताजनक

शहरीकरण की यह रफ्तार एक ऐसे वातावरण को भी जन्म दे रही है, जिसमें सांस लेना दूभर होता जा रहा है। वाहनों में ईंधन के जलने से उत्सर्जित कार्बन की समस्या हिमालय को लील रही है।

ब्लैक कार्बन के रूप में इसे हिमालयी ग्लेशियर के पिघलने की वजह भी माना जा रहा है। केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड के मुताबिक पर्टिकुलेट मेटर (पीएम, नाइट्रेट, सल्फेट, धूल आदि के कण) देश के 50 प्रतिशत शहरों में खतरनाक स्तर को पार कर चुकी है।

28 प्रतिशत शहरों में इसकी मौजूदगी उच्च है। 21 प्रतिशत शहरों में सामान्य और सिर्फ एक प्रतिशत शहरों में कम है। जाहिर है कि इस मानक के हिसाब से देश के अधिकतर शहरों में साफ हवा अब दूभर है।

घटता जंगल, प्रदूषित होती हवा, जहरीला होता पानी
घटता जंगल, प्रदूषित होती हवा, जहरीला होता पानी अब पर्यावरणविदों की चिंता में शामिल होता जा रहा है। उत्तराखंड में 1970 के दशक में चिपको के जरिए जंगल को बचाने की बात करने वाले पर्यावरणविद् और गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित चंडी प्रसाद भट्ट इस ओर इशारा भी कर रहे हैं।
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