पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित किसान कुंभ में देश में खेती किसानी पर गहराया संकट भी उभर आया। यह भी साफ हुआ कि इस संकट से निजात पाने के लिए एक ही रास्ता है और यह वही रास्ता है, जिसे देश के एक प्रतिशत प्रगतिशील किसान अपना रहे हैं। किसान अब सिर्फ धरती पुत्र ही नहीं, मार्केटिंग गुरु भी हैं, पर्यावरण की नब्ज पहचानने वाला भी हैं और अपने उत्पाद का मूल्यांकन करना भी जानते हैं।
पहले बात हुई खेती के संकट की। पद्मश्री कंवल सिंह चौहान ने कहा कि किसान का बेटा खेती करना नहीं चाहता। रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक खेती खा गए। पद्मश्री भरत भूषण त्यागी ने कहा किसान के लिए खेती फायदे का सबब नहीं है। हरित क्रांति का फायदा हर जगह नहीं पहुंच पाया, बल्कि कई जगह इससे नुकसान हुआ है।
खेती को इस संकट से निकालने का रास्ता भी इसी मंथन से उपजा। पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. तेज प्रताप के मुताबिक नए दौर की खेती (न्यू ऐज फार्मिंग) की खोज तीन साल पहले शुरू हुई थी। ऐसे कई किसान मिले, जिनका लक्ष्य सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं है। वे अपने उत्पाद का मूल्य जानते हैं और उसकी कीमत हासिल करने को लेकर भी सजग रहते हैं। शोध संस्थाओं से सीधा वास्ता रखने वाले ये किसान खुद को समय के साथ बदल रहे हैं।
पद्मश्री भारत भूषण त्यागी के मुताबिक 40 साल की खेती से उपजे अनुभव में उन्होंने पाया कि खेती के लिए प्रकृति की व्यवस्था का गहराई से अध्ययन जरूरी है। आखिरकार उत्पादन बढ़ाकर नहीं बल्कि गुणवत्ता बढ़ाकर उन्होंने खेती से लाभ कमाना सीखा। वे किसानों को यह भी बता रहे हैं कि उत्पाद को कैसे बजार तक ले जाया जाए और इसे कैसे बेचा जाए। अब वे प्रति एकड़ चार से छह लाख रुपये कमा रहे हैं। समूह में खेती और बाजार तक सीधी पहुंच आज का मूलमंत्र है।
गुरुग्राम में हमने एक ही तरह की दाल के तीन अलग अलग पैकेट बनाए और कीमत 80 रुपये, 160 रुपये और 380 रुपये रखी। ब्रांड भी उसी समय तय किया गया। बाद में मिले फीडबैक में सामने आया कि 80 रुपये के पैकेट किसी ने देखे तक नहीं, 160 के पैकेट को देखा भर और 380 रुपये का पैकेट खरीदा। हमने पूछा ऐसा क्यों? उपभोक्ताओें ने मूल्य के आधार पर गुणवत्ता तय की थी। उपभोक्ताओं की इसी नब्ज को पहचानकर जैविक खेती के नाम पर तमाशा किया जा रहा है। यह बंद होना चाहिए।
-पद्मश्री भारत भूषण त्यागी