कभी भेड़-बकरी पालन को दोयम दर्जे का कार्य माना जाता था, लेकिन रानीपोखरी की श्वेता तोमर ने इस काम में नए आयाम गढे़ हैं। फैशन डिजाइनिंग की चकाचौंधभरी दुनिया छोड़ श्वेता ने इसे अपना पैशन बना लिया। श्वेता बकरियों के साथ अपने फार्म में गो-पालन और मुर्गी पालन भी कर रही हैं। नई तकनीक पर आधारित इस फार्म में घुसते ही आपको हर चीज व्यवस्थित और नई तकनीक से लैस नजर आती है। बकरी पालन के लिए बना प्लेटफार्म और वहां लगे उच्च तकनीक के सीसीटीवी कैमरे इसकी तस्दीक करते हैं।
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फैशन डिजायनिंग छोड़ पहाड़ की बेटी ने बकरी पालन को बनाया पैशन
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shweta tomar agro farming
- फोटो : amar ujala
रानीपोखरी न्याय पंचायत क्षेत्र के भोगपुर गांव की रहने वाली श्वेता तोमर ने एग्रो फार्मिंग की शुरूआत कर अपने पिता स्व.प्रेम सिंह तोमर का सपना साकार किया है। विज्ञान में स्नातक और उसके बाद निफ्ट से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद श्वेता ने नोएडा और दिल्ली में कुछ साल फैशन इंडस्ट्री में काम किया। लेकिन, श्वेता के दिमाग में हमेशा पिता का सपना घूमता था, वह अपना एग्रो फार्म खोलना चाहते थे।
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- फोटो : demo pic
आखिरकार श्वेता ने नौकरी छोड़कर पिता के सपने को पूरा करने की ठानी और उन्हीं के नाम पर जनवरी, 2016 में प्रेम एग्रो फार्म की स्थापना की। चार बहनों में तीसरे नंबर की श्वेता के पास आज फार्म में अलग-अलग नस्लों की सौ से भी ज्यादा बकरियां हैं। इनमें सिरोही, बरबरी, जमना पारी और तोता पारी ब्रीड के पांच हजार से लेकर एक लाख तक के बकरे मौजूद हैं।
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बकरियों के लिए बने विशेष तरह के प्लेटफार्म के नीचे मुर्गी पालन किया जाता है। गोशाला अलग से बनाई गई है। बकौल श्वेता, ‘जमीन अपनी थी, पति रोबिन के साथ मिलकर करीब एक करोड़ का प्रोजेक्ट बनाया था, लेकिन कोई भी बैंक इतना लोन देने को तैयार नहीं था। फिर पीएनबी ने 30 लाख का लोन पास किया। इसके बाद आठ लाख रुपये खुद से लगाकर फार्म शुरू कर दिया।’ श्वेता के पति बंगलूरू में आईटी के क्षेत्र में काम करते हैं। वहीं श्वेता ने गोट फार्मिंग के बारे में सुना और देखा। इसके बाद कई फार्म विजिट करने के बाद पिता के सपने को हकीकत में बदलने का फैसला लिया।
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आज श्वेता इस काम में महारत हासिल कर चुकी हैं। वह बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटी-मोटी दवा-दारू भी कर लेती हैं। जरूरत पड़ने पर वह खुद ही बकरों को बिक्री के लिए लोडर में लादकर मंडी ले जाती हैं। दूध के अलावा बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी करती हैं। श्वेता बताती हैं शुरुआत में सरकारी स्तर पर छोटी-मोटी कई दिक्कतें आईं पर पशुपालन विभाग का उसे भरपूर सहयोग समय-समय पर मिलता रहा।
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क्षेत्र में श्वेता की कर्मठता और जिंदादिली के सब कायल हैं। माता-पिता की चारों संतान बेटी के रूप में पैदा हुईं। पिता की मृत्यु के बाद जब क्रियाकर्म की बारी आई तो श्वेता खुद से आगे आई। बेटे की तरह ही उसने और बहनों सभी कर्मकांड पूरे किए। पिता की चिता को किसी लड़की द्वारा अग्नि देने का क्षेत्र में यह पहला मामला था, जो उस समय अखबारों की सुर्खियां भी बना।
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गोट फार्मिंग की शुरूआत आप छोटे स्तर पर भी कर सकते हैं। इसमें 10 बकरियों पर एक बकरा रखा जाता है। सामान्य प्रजाति की बकरियां रखने पर इसमें करीब एक से डेढ़ लाख रुपये की लागत आती है। बशर्ते जमीन अपनी हो। उन्नत नस्ल की बकरियां रखने पर लागत थोड़ा बढ़ जाती है।
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गोट फार्मिंग में बकरियों को रखने का शेड विशेष तरीके से बनाया जाता है। इसमें जमीन से करीब 5 से 7 फीट ऊपर लकड़ी का प्लेटफार्म बनाया जाता है। इसके बेस में लगी लकड़ी की फट्टियों में कुछ इंच का गेप छोड़ दिया जाता है। ताकि बकरियों का मल-मूत्र सीधे जमीन में चले जाए। इससे बार-बार सफाई की जरूरत नहीं पड़ती।
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दूसरा बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है। इसके अलावा बकरियों को दिया जाने वाला पौष्टिक आहार, चारा, और समय-समय पर लगने वाले टीकों से संबंधित जानकारी उत्तराखंड भेड़ एवं ऊन विकास बोर्ड (यूएलडीबी) द्वारा ट्रेनिंग के दौरान दी जाती है।
बकरी पालन को अब लोग व्यावसायिक तौर पर अपना रहे हैं। विभाग भी समय-समय पर इसके लिए ट्रेनिंग देता है। श्वेता ने भी विभाग से ट्रेनिंग लेने के बाद अपना व्यवसाय शुरू किया।
- डॉ. अविनाश आनंद, मुख्य अधिशासी अधिकारी, उत्तराखंड भेड़ एवं ऊन विकास बोर्ड