बदरीनाथ के मुख्य धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल का कहना है कि यहां पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। तर्पण करने से पहले तप्तकुंड में स्नान करने के बाद तीर्थ पुरोहित के साथ ब्रह्म कपाल में पितरों का ध्यान किया जाता है। पितरों को श्रद्धा भक्ति से पूजने पर धन-धान्य में वृद्धि होती है। मुख्य धर्माधिकारी कहते हैं कि पितरों का श्राप देवताओं से भी अधिक कष्टकारी होता है। ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि जिनके पितर नाराज हो जाते हैं, उनकी ग्रह दशा अच्छी भी हो, तब भी उनके जीवन में हर पल परेशानी बनी रहती है।
ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए थे भगवान शिव
पौराणिक मान्यता है कि सृष्टि की उत्पति के समय जब ब्रह्मा मां सरस्वती के रुप पर मोहित हो गए तो भोलेनाथ ने गुस्से में आकर ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक को त्रिशूल के वार से काट दिया। तब सिर त्रिशूल पर ही चिपक गया। ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब भोलेनाथ पृथ्वी लोक के भ्रमण पर गए तो बदरीनाथ से करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर जमीन पर गिर गया। तभी से यह स्थान ब्रह्म कपाल के रुप में प्रसिद्ध हुआ। शिवजी भी इसी स्थान पर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए थे। गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्ग की ओर जा रहे पांडवों ने भी इसी स्थान पर अपने पितरों को तर्पण दिया था।