उत्तराखंड राज्य आंदोलन और आंदोलनकारियों की भावना का केंद्र रहे गैरसैंण पर प्रशासनिक उदासीनता भारी पड़ रही है। हालात यह है कि यहां जिला स्तरीय प्रशासनिक कामों जहां लोगों को तीन दिन लगाकर कर 100 किमी से अधिक दूर गोपेश्वर दौड़ना पड़ता है।
वहीं तहसील स्तरीय काम काज के लिए पटवारी ढूढ़े से नहीं मिलता। कारण तहसील में पटवारियों का भारी टोटा होना है। पटवारियों की कमी का आलम यह है कि एक पटवारी के पास 50 से अधिक गांवों की सुरक्षा के साथ ही प्रशासनिक काम काज का भी जिम्मा है।
तीन साल पहले गैरसैंण से आदिबदरी तहसील अलग होने के बाद गैरसैंण में 8 पटवारी क्षेत्र बच गए। लेकिन पटवारी नहीं बढ़े। हालात यह हैं कि गैरसैंण, पांचाली, पज्याणा सहित सिलपाटा के छह गांवों का जिम्मा एक पटवारी के पास है। साथ ही कानून गो (राजस्व निरीक्षक) का प्रभार भी इसी पटवारी के पास है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि तीन पटवारी क्षेत्र के करीब पचास से अधिक गांवों में प्रशासनिक काम और सुरक्षा व्यवस्था के काम किस तेजी से पूरे होंगे। यही नहीं मेहलचौंरी और रोहिड़ा पटवारी क्षेत्रों में एक पटवारी तैनात किया गया।
जबकि इसी पटवारी को आरके (रजिस्ट्रार कानून गो) का चार्ज भी दिया गया है। जिला बनाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष पीएस नेगी का कहना है कि प्रशासनिक व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए जहां लगातार गैरसैंण को जिला बनाने की मांग की जा रही है।
वहीं तहसील समेत सभी विभागों में कर्मियों के रिक्त पदों को भरने की मांग की जा रही है। लेकिन शासन और सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। जिससे लोगों को एक प्रमाण पत्र बनाने के लिए कई दिन पटवारियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। वहीं दूसरी ओर एसडीएम स्मृता परमार ने बताया कि पूरे चमोली जिले में पटवारियों की कमी बनी है। कई बार उच्चाधिकारियों को पत्राचार कर समस्या दूर करने के लिए कहा गया है। अब नए पटवारियों के आने पर ही समस्या दूर हो पाएगी।