ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष में तीर्थनगरी हरिद्वार में कथा प्रवचन की भरमार है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हरिद्वार में होने वाली कथाएं अद्भुत होती जा रही हैं।
गंगातट पर जिन्हें कथा सुनानी है वे अपने श्रोता भी राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से साथ लेकर आ रहे हैं। इस समय पंचपुरी में सौ से अधिक स्थानों पर कथाएं चल रही हैं। सुनने वाले श्रोताओं में हरिद्वार का कोई नहीं है।
बैसाख, जेठ, श्रावण, कार्तिक और माघ ऐसे महीने हैं जिनमें देश के विभिन्न भागों से कथाकार भागवत, रामायण, शिवपुराण, विष्णु पुराण आदि लेकर हरिद्वार आते हैं।
बड़े-बड़े पूंजीपति होते हैं संयोजक
भक्तों को पहले ही कथा की तिथियां निमंत्रण पत्र के माध्यम से भेज दी जाती हैं। कथा व्यासों की हरिद्वार में होने वाली कथाओं के संयोजक बड़े-बड़े पूंजीपति होते हैं।
कथा व्यास और पूंजीपति अपने नगरों से ही रिश्तेदार श्रोता लेकर आते हैं। एक नहीं लगभग सभी कथाओं का यही आलम है।
आश्चर्य का विषय है कि हरिद्वारवासियों को कथाओं में कोई रुचि नहीं। कोई भी कथा ऐसी नहीं जिसे सुनने स्थानीय जन जाएं।
यहां तक की मुरारी बापू और रमेश भाई ओझा जैसे कथाकारों की कथाओं में भी स्थानीय जनता बेहद कम पहुंचती है। अब ज्येष्ठ पूर्णिमा पर हरिद्वार में चल रहीं कथाओं का समापन होगा।
विशाल भंडारों के बाद कथा व्यास और श्रोता अपने घरों को लौट जाएंगे। श्रावण में फिर नए सिरे से यह सिलसिला शुरू होगा।
बस्ती में कोई नहीं सुनाता कथा
हरिद्वार की सभी कथाएं उत्तरी हरिद्वार और कनखल के संत बाहुल्य क्षेत्र में होती हैं। इनके विशाल पंडाल आश्रमों के समीप मैदानों में सजाए जाते हैं।
पंचपुरी की जिन गरीब और दलित बस्तियों को वास्तव में कथा की जरूरत है, उन्हें कोई कथा नहीं सुनाता।
कथाएं बेशुमार हो रही हैं। बहुत कम कथाकारों की वाणी में ओज है। दुर्भाग्य से कथाओं के संदेश फीके पड़ते जा रहे हैं। जिनकी वाणी में ओज है उन्हें सुनने के लिए बाहरी और स्थानीय सभी आते हैं। संकट यह है कि कथाओं के नाम पर कोरी लकीरें पीटी जा रही हैं, संदेश कम मिल रहे हैं।
- श्रीमहंत ज्ञानदास, अध्यक्ष अखाड़ा परिषद
हमारी तो पूरी जवानी पर्वतीय अंचलों और वनांचलों में कथा सुनाते बीत गया। यह सच है कि जिन लोगों को वास्तव में कथाओं और प्रवचनों की आवश्यकता है, उन तक आज के व्यास नहीं पहुंचते। देश को बदलना है तो फिर प्रवचनकर्ताओं को सुदूर क्षेत्रों में भटकना होगा। देश तभी सचमुच बदल पाएगा।
- स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि, निवृत शंकराचार्य