अगर कोई बार-बार मोबाइल फोन से सेल्फी लेता है, उसे पोस्ट करता है और लाइक्स पाकर खुशी से उछलने लगता है तो सतर्क हो जाए, वह मानसिक रोग की चपेट में है।
इस बीमारी के लक्षण सैकड़ों साल पहले ग्रीस में खोजे गए रोग नासीसिज्म से मिलते हैं। मनोचिकित्सक भी इसे मेंटल डिस्आर्डर बता रहे हैं। सेल्फी एडिक्ट रोगियों की संख्या मनोचिकित्सकों के यहां बढ़ रही है। इसके साथ ही कभी ट्रेन, कभी आग तो कभी पानी के सामने सेल्फी लेने की कोशिश में कई लोगों की जान भी जा चुकी है।
मनोचिकित्सकों का कहना है कि सेल्फी एडिक्ट रोगी ठीक हो रहे हैं। रोगी को जैसे ही घरवाले अंटेंशन और प्यार देने लगते हैं लक्षण धुंधले पड़ने लगते हैं। अमेरिकन साइक्लोजिकल एसोसिएशन के डाइग्नोस्टिक एंड स्टेटिस्टिकल मैनुअल-5 (डीएसए) में भी सेल्फी एडिक्शन को मेंटल डिस्आर्डर बताया गया है। यदि कोई व्यक्ति तीन और इससे अधिक सेल्फी लेकर आनलाइन पोस्ट करता है तो वह इस बीमारी से ग्रस्त हो सकता है।
यह भी देखा जा रहा है कि अकेलापन महसूस करने वालों को सेल्फी एडिक्शन जल्दी हो जाता है। कुछ दिन पहले एक लड़का एम्स में भर्ती हुआ। उसने एक दिन में दो सौ सेल्फी ली थी। इलाज के बाद पता चला कि उस लड़के को अकेलेपन की वजह से यह लत लगी थी।
ये है नासीसिज्म
खासकर दुर्घटना वाली जगहों पर सेल्फी लेने वाले लोग इस बीमारी से अधिक पीड़ित होते हैं। वैसे इस बीमारी के लिए वह खुद जिम्मेदार नहीं होते बल्कि परिस्थितियां उनको ऐसा बना देती है। अमेरिकन साइक्लोजिकल एसोसिएशन ने इसे ऑबसेसिव कंपलसिव डिस्आर्डर की श्रेणी में इस रोग को रखा है। इसे सेल्फीटिस नाम दिया है। दून में भी सेल्फी एडिक्ट की संख्या तेजी से बढ़ी है।
ग्रीक किवंदतियों के मुताबिक नासीसस नामक एक युवक को भ्रम हो गया कि वह दुनिया का सबसे सुंदर व्यक्ति है। एक दिन उसने अपना अक्श पानी में देखा और दीवाना होकर खुद को ढूंढने लगा। सालों बाद वह फिर नदी के पास से गुजरा, अपना अक्श देखा और खुद को पकड़ने के लिए नदी में कूदकर मर गया। उसके बाद नासीसिज्म मनोरोग की खोज हुई।
केस नंबर-1
रायपुर क्षेत्र निवासी 41 वर्षीय एक महिला को सेल्फी लेने की इस कदर आदत पड़ चुकी थी। बच्चों के स्कूल जाकर क्लास रूम में भी वह सेल्फी लेने लगी थी। महिला का घर पर भी इस बात को लेकर मजाक बनने लगा था। आखिरकार वह मनोवैज्ञानिक के पास पहुंची और बताया कि वह अपनी इस आदत से परेशान हो गई हैं। जब मनोचिकित्सक ने उससे बात की तो पता चला कि घर पर उन्हें अटेंशन नहीं मिलती थी। पति भी काम के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे। वह खुद को नेगलेक्ट फील करती थी। ऐसे में वह अनरियल वर्ल्ड को रियल वर्ल्ड मान फोटो पोस्ट करती और अपनी तारीफ चाहती थी। मनोवैज्ञानिक की ओर से बच्चों और पति को यह बात समझाई। महिला को घर पर अटेंशन मिला तो उनकी सेल्फी लेने की आदत बेहद कम हो गई।
डॉक्टरों की जुबानी
केस नंबर-2
धर्मपुर निवासी 18 वर्षीय एक युवती की मां नहीं है। वह घर पर पिता के साथ अकेले रहती है। युवती के दोस्त भी अधिक नहीं है। इसके बावजूद उसे हमेशा खुद को अलग दिखाने की चाहत रहती थी। उसे सेल्फी की लत लग गई। पिता को बेटी की यह आदत पता लगते ही वह मनोचिकित्सक के पास पहुंचे। उन्होंने बच्ची की कला को निखारने और ध्यान बांटने की बात कही तो पिता ने उसे फाइन आर्टस स्कूल में डाल दिया। धीरे-धीरे उसका ध्यान बंटा तो आदत भी बदल गई और वह फेसबुक में अपनी नहीं बल्कि अपने काम अपनी आर्ट की फोटो डालती है और उसकी तारीफ पर खुश होती है।
अलग दिखने की चाहत और सुंदरता की तारीफ
-जब किसी व्यक्ति को घर पर अटेंशन और तारीफ नहीं मिलती तो वह उसे फेसबुक जैसे अनरियल वर्ल्ड में ढूंढता है। तारीफ से वह खुश हो जाता है। ऐसी व्यक्ति का लिंबिक सिस्टम (प्लेजर सेंटर) ओवर एक्टिव हो जाता है। किसी परिस्थिति में वह अधिक एक्टिव हो जाता है। जरूरी है कि घर पर प्यार और अटेंशन दिया जाए।
-डा. श्रवि अमर अत्री, मनोचिकित्सक
-अक्सर युवाओं को खुद को अलग दिखाने की चाहत होती है। यही वजह है कि वह किसी दुर्घटना वाली जगहों पर भी सेल्फी लेने लगते हैं। यह कोई शौक नहीं बल्कि एक बीमारी है। ऐसे बच्चों की ओर अभिभावकों को विशेष ध्यान देना चाहिए और घर पर ही उनकी खूब तारीफ करनी चाहिए। किसी दूसरे बच्चे से उनकी तुलना कभी नहीं करनी चाहिए। घर पर प्यार, केयर पाकर वह अनरियल वर्ल्ड में यह तारीफ नहीं ढूंढेंगे।
-डॉ. मुकुल शर्मा, मनोचिकित्सक