एक कंपनी के स्कूटर के विज्ञापन वाय शुड बॉयज हैव ऑल द फन? यानि लड़के ही सारी मस्ती क्यों करें? यह विज्ञापन वैसे तो लड़कियों को उत्प्रेरित करने के लिए बनाया गया है, लेकिन इसमें सामाजिक बदलाव की आहट है।
मतलब साफ है कि लड़के यदि बाइक की रफ्तार के रोमांच का आनंद ले सकते हैं तो लड़कियां पीछे क्यों रहें? यह बदलाव देहरादून में भी दिखाई देने लगा है। लड़कियों के स्कूटर (स्कूटी) की बिक्री लड़कों की बाइक से आगे निकल गई है।
समाजशास्त्री और मनोचिकित्सक मानते हैं कि समाज में महिलाओं को मिली आजादी की वजह से स्कूटर की बिक्री बढ़ी है। कहते हैं कि आज लड़कियां, युवतियां और महिलाएं स्कूल, कॉलेज और दफ्तर स्कूटर से आ-जा रही हैं।
यह उनके लिए उपयोगी, सरल और सुविधाजनक वाहन है। यही वजह है कि यह उनकी पहली पसंद बन गया है। लड़कियां और महिलाएं जितना घर से बाहर निकलेंगी उतनी ही इसकी मांग बढ़ेगी।
दून के संभागीय परिवहन कार्यालय के आंकड़े बताते हैं कि साल 2002 से साल 2012 तक दून में बाइक की बिक्री अधिक रही। लेकिन वर्ष 2013 से स्कूटर की मांग बाइक से अधिक हो गई, जोकि 2014 में भी बनी रही। आंकड़े यह भी बताते हैं कि स्कूटर की मांग साल दर साल बढ़ती गई है।
सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी (एआरटीओ) संदीप सैनी कहते हैं कि स्कूटर स्कूल जाने वाले बच्चों, खासकर लड़कियों में, बहुत लोकप्रिय है। बिना गियर का होने की वजह से इसे चलाना आसान है। इस वजह से कक्षा 9 से ही लड़कियां इसे लेकर स्कूल जाने लगी हैं।
इसके अलावा इसका 16 साल की उम्र से ही ड्राइविंग लाइसेंस बन जाता है। जबकि बाइक कॉलेज जाने वाले युवकों में ही लोकप्रिय है। सैनी बताते हैं कि स्कूटर को परिवार का हर सदस्य चला सकता है जबकि बाइक को हर कोई नहीं चला पाता। यह भी एक वजह है कि स्कूटर की बिक्री बढ़ी है।
एसएसपी पुष्पक ज्योति का कहना है कि स्कूटर को हर वर्ग के हर उम्र के लोग चला सकते हैं, जबकि बाइक केवल लड़कों में लोकप्रिय है। चूंकि स्कूटर के इस्तेमाल करने वालों में महिलाएं, लड़कियां और युवतियों की संख्या अधिक है तो इसकी मांग बढ़ना स्वाभाविक है।
इसी तरह एसपी ट्रैफिक प्रदीप राय भी उनकी बातों से इत्तफाक रखते हैं। राय कहते हैं कि स्पीड के मामले में स्कूटर भी बाइक से कम नहीं है। यह महिलाओं की पसंदीदा सवारी तो है ही घर में आने के बाद इसे प्रत्येक सदस्य इस्तेमाल करता है।