राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक मदद करेंगे
- फोटो : SELF
देश में हर साल बाढ़ और सूखे से होने वाली तबाही रोकने में अब रुड़की स्थित राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक मदद करेंगे। केंद्र सरकार के निर्देश पर संस्थान के वैज्ञानिकों ने नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट का खाका तैयार किया है। आठ साल की अवधि वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर कुल 3640 करोड़ रुपये खर्च होंगे, जिसका आधा खर्च विश्व बैंक वहन करेगा।
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक और नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट के कोआर्डिनेटर ट्रेनिंग डॉ. अनिल कुमार लोहानी ने परियोजना के बाबत बताया कि नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट का जो मसौदा तैयार किया है कि उसके तहत संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम राज्य वार प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएगी। कार्यक्रम के तहत बाढ़ प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों और अफसरों को यह जानकारी दी जाएगी कि नदियों में हर साल आने वाली बाढ़ की तबाही को कैसे कम किया जाए और नदियों के पानी को कैसे नियंत्रित किया जाय।
इस दौरान रिवर बेसिन मैनेजमेंट के साथ ही भूमिगत जल के प्रबंधन से जुड़ी तमाम तकनीकी जानकारियां मुहैया करायी जाएंगी। ट्रेनिंग कोआर्डिनेटर डॉ. लोहानी के मुताबिक इस परियोजना में विश्व बैंक 1820 करोड़ की वित्तीय सहायता मुहैया करा रहा है जबकि इतना ही बजट केंद्र सरकार देगी। जहां तक राज्यों का सवाल है तो राज्यों को एक भी रुपया नही खर्च करना है। केंद्र सरकार राज्यों को पूरी वित्तीय सहायता मुहैया कराएगी।
आयरलैंड, नीदरलैंड की तकनीक से रोकी जाएगी तबाही
ट्रेनिंग कोआर्डिनेटर डॉ. लोहानी के मुताबिक फ्लड मैनेजमेंट के क्षेत्र में आयरलैंड और नीदरलैंड जैसे देशों ने अच्छा काम किया है इन देशों में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों को देश में भी इस्तेमाल किया जाएगा। राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के अलावा देश के अन्य वैज्ञानिक तकनीकी दक्षता हासिल कर सकें, इसके लिए यूनेस्को- आइएचई में भी वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण के लिए भेजा जाएगा।
बाढ़ प्रबंधन की नाकामी पर सीएजी ने भी जतायी थी नाराजगी
बाढ़ का खतरा साल दर साल बढ़ता जा रहा है
- फोटो : amarujala
भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सालाना रिपोर्ट में देश में बदहाल फ्लड मैनेजमेंट पर गहरी नाराजगी जता चुके हैं। सीएजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और गुजरात जैसे राज्य देश की जीडीपी में 27 फीसदी की हिस्सेदारी रखते है, लेकिन बेहद खराब फ्लड मैनेजमेंट और बजट का सही इस्तेमाल नही करने से इन राज्यों के करोड़ों लोगों को बाढ़ से होने वाली तबाही का सामना करना पड़ता है। सीएजी रिपोर्ट में बाढ़ प्रबंधन को लेकर तमाम राज्यों में संचालित प्रोजेक्ट के बंद होने पर भी गहरी नाराजगी जता चुका हैं।
बढ़ते तापमान से बढ़ा बाढ़ का खतरा
एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के मुताबिक भारत, चीन, दक्षिण पूर्वी एशिया, पूर्वी अफ्रीका जैसे देशों में कार्बन उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है और इस कारण इन देशों में तापमान बढ़ने के साथ बाढ़ का खतरा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।
कई राज्य कर रहे फ्लड बिल का विरोध
बाढ़ से होने वाले तबाही से लोगों को बचाने के लिए केंद्रीय जल आयोग ने 1975 में मॉडल फ्लड बिल का ड्राफ्ट तैयार किया था, लेकिन चार दशक बीतने के बावजूद इस बिल को अमलीजामा नही पहनाया जा सका है। इस बिल के लागू होने के बाद अधिकारियों को बाढ़ प्रभावित इलाकों में बस्तियों को जबरन हटाने का अधिकार होगा और इन बस्तियों के लोग दोबारा वहां नही बस सकेंगे। कई राज्य इस तर्क के साथ इस बिल का विरोध कर रहे हैं कि आखिरकार ऐसे लोगों को विस्थापित करने के बाद बसाया कहां जाएगा।