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आपदा से बचने को नए सिरे से बसानी होगी आबादी

Thu, 03 Nov 2016 10:03 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
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आपदा से जन-धन की हानि बचाने के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में नए सिरे से टाउन प्लानिंग करनी होगी। आबादी बसाने के लिए नए सुरक्षित क्षेत्रों को विकसित करना होगा।
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ऐसा न करने पर हर साल बारिश में बादल फटने से और अधिक तबाही झेलनी पड़ सकती है। इसकी वजह ग्लोबल वार्मिंग से हो रहा जलवायु परिवर्तन है। इससे माहौल में नमी बढ़ रही है। घाटियों और झील वाले क्षेत्रों में नमी और अधिक बढ़ जाती है, जिससे बारिश में बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं।

उत्तराखंड में बादल फटने का मुख्य कारण स्थानीय परिस्थिति मिली है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों की टीमों ने उत्तरकाशी, चमोली आदि जिलों में बादल फटने के स्थलों का बारीकी से अध्ययन किया। इसके साथ ही वर्ष 1970 से बादल फटने की घटनाओं के आंकड़े देखे।
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विज्ञानियों का कहना है बादल फटने की घटनाएं वहां अधिक हो रही हैं, जहां पानी का जमाव रहता है। इसके अलावा घाटियों में नमी अधिक रहती है। इस वजह से एक साथ इकट्ठी बारिश हो जाती है। 

विज्ञानियों का कहना है कि आबादी के रहने के लिए नए क्षेत्रों को ‘रिलोकेट’ करना पड़ेगा, जिससे बादल फटने से नुकसान न होने पाए। अध्ययन के दौरान पाया गया कि दक्षिण-पश्चिमी मानसून की शुरुआत में बादल अधिक फटते हैं।

घाटियों और झीलों के आसपास इलाकों में अधिक आबादी बसी है। लोगों ने पर्यावरणीय स्थिति को समझे बिना घर बना लिए हैं। जब बादल फटता है तो पानी का सैलाब सब बहा ले जाता है। लोकल पर्यावरणीय स्थिति को जलवायु परिवर्तन और गंभीर बना दे रहा है। 

बादल फटने के लोकल कारण भी हैं। झीलों से वाष्पीकरण अधिक होने और ग्लोबल वार्मिंग से स्थिति बिगड़ रही है। इसके लिए सुरक्षित स्थानों पर गांव बसाने और टाउन प्लानिंग की जरूरत है। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव और झीलों को तो नहीं हटाया जा सकता, लेकिन आबादी सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट की जा सकती है।
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- डॉ. एके गुप्ता, निदेशक वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान
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