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मिल गया गन्ना किसानों की खुशहाली का रास्ता

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कई कारणों से किसान गन्ने की खेती से मुंह मोड़ने को मजबूर हैं, लेकिन अब ऐसा तरीका ढूंढ लिया गया है जिससे किसान खुशहाल हो जाएंगे।
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वैज्ञानिक विधि डी-मीटर को अपनाकर कई किसान कम लागत में ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। इससे उनकी आमदनी बढ़ रही है। यह खेती जैविक विधि से होती है। इस गन्ने के उत्पाद गुड़, शक्कर और खांड आदि की मांग जर्मनी, इंग्लैंड और अमेरिका आदि देशों में भी काफी बढ़ रही है।

किसान क्लब से जुड़े कई किसान अब तक इस विधि को अपना चुके हैं। इस विधि से खेती करना सामान्य विधि से काफी सस्ती भी है। जैविक प्लांट में इस गन्ने को बेचा जाता है, हालांकि गन्ने का प्रति क्विंटल दाम तो करीब बराबर ही है, लेकिन इस पर खर्च कम आता है और इसे बेचने पर पैसा नगद मिल रहा है।
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ
उत्तराखंड जैविक बोर्ड के जिला सेवा प्रदाता सर्वेश कुमार शर्मा के अनुसार जैविक खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ रहा है। रासायनिक खाद रहित इस खेती से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ता है, वहीं स्वावलंबन के रास्ते भी खुल रहे हैं। साथ ही यह खेती जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी मददगार है। जैविक बोर्ड इसके प्रचार-प्रसार के लिए लगातार काम कर रहा है।

यह है डी-मीटर विधि

इस विधि के तहत गन्ने की फसल में रासायनिक खाद और कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। किसान केवल कंपोस्ट या जैविक खाद ही इस्तेमाल किया जाता है। डी-मीटर जैविक खेती की ही श्रेणी है, लेकिन इस विधि को वहीं किसान अपना पाता है जो अपनी खेती में शत-प्रतिशत जैविक खेती कर रहा है।

इस विधि के तहत चार फीट की दूरी पर गन्ने की लाइन बनाई जाती है। दोनों लाइनों के बीच में गन्ने की पत्तियां डालकर जमीन को ढक दिया जाता है। पत्तियों के नीचे नमी रहने से जमीन में लाभदायक जीवाश्म पैदा हो जाते हैं, जो जमीन की उर्वरा क्षमता को संतुलित बनाए रखता है।

वहीं पत्तियों के नीचे केंचुए और अन्य कीट मिट्टी में छेद कर देते हैं, जिससे पानी गन्ने की जड़ों तक पहुंच जाता है। इस विधि से बोया गया गन्ना छह-सात साल तक लगातार फसल देता है। जबकि सामान्य गन्ने की फसल दो साल मिल पाती है, ऐसे में यह ज्यादा लाभकारी है।
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अभी जुड़े हैं आठ किसान

क्षेत्र में जैविक खेती तो करीब 500 किसान कर रहे हैं, लेकिन डी-मीटर पद्धति खेती केवल आठ किसान ही कर रहे हैं।

इनमें शेरपुर निवासी विजयपाल, बालुपुर के सतीश, साबतवाली निवासी और किसान क्लब के अध्यक्ष कटार सिंह, ज्ञान सिंह, हाकम सिंह, मानसिंह, गिरवर सिंह आदि का कहना है कि साबतवाली गांव में लगाए गए प्लांट में वह गुड़, शक्कर और खांड आदि तैयार कराते हैं, इसे किसान क्लब की मदद से विदेशों में भेजा जाता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार करने वाली ग्रीन फिस्टा कंपनी के मार्फत उनके उत्पाद जर्मनी, अमेरिका और इंग्लैंड में बेचे जा रहे हैं। किसान क्लब के अध्यक्ष चौधरी कटार सिंह के अनुसार क्षेत्र में जैविक गुड़ और शक्कर बनाने का यह एकमात्र प्लांट है ऐसे और प्लांट लगाए जाने की जरूरत है। इस तरह के कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किया जा रहा है।

इसलिए है ज्यादा फायदेमंद
हर साल गन्ना नहीं बोना पड़ता, जिससे पांच साल तक आने वाला खर्च बच जाता है। सामान्यतया गन्ना बोने पर करीब 40-50 क्विंटल प्रति बीघा उत्पादन मिलता है, जबकि इस विधि से करीब 60 क्विंटल प्रति बीघा गन्ने का उत्पादन मिल रहा है।
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