उत्तराखंड गठन 14 साल पूरे हो गए, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं इन 14 सालों में भी नहीं सुधरी। हालात बद से बदतर हो गए हैं।
लोगों की सेहत से खिलवाड़
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के नाम पर सरकारी अस्पतालों को निजी हाथों में देकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ जारी है। लगता है स्वास्थ्य महानिदेशालय ने सिर्फ पैसा ‘लुटाने’ के लिए ही शील नर्सिंग होम से अनुबंध किया है।
चौखुटिया सीएचसी समेत प्रदेश के आठ अस्पतालों का ठेका लेने वाले शील नर्सिंग होम बरेली को दवाओं के लिए भी सालाना तीन लाख रुपए का भुगतान तय किया गया है। वह भी तब जबकि अस्पताल में सरकारी दवाइयां उपलब्ध हैं।
दवा अगर इमरजेंसी में बाहर से खरीदी जाती है तो वह शील नर्सिंग होम के खाते में नहीं, सरकार के खाते में जुड़ती है। करोड़ों रुपए की आलीशान इमारत में अस्पताल चलाने का कोई किराया भी प्रबंधन को नहीं देना पड़ता है। ऊपर से वारे-न्यारे अलग।
जिले के प्रभारी मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) केसी भट्ट इस बात को स्वीकार करते हैं कि पीपीपी मोड के संचालकों द्वारा डॉक्टरों की नियुक्ति में ही नहीं बल्कि हर मामले में मनमानी की जा रही है। उनका कहना है कि अनुबंध सीधे स्वास्थ्य महानिदेशालय और शील नर्सिंग होम के मालिक के बीच होने से उनकी भूमिका सिर्फ बिलों में हस्ताक्षर करने तक रह गई है।
15 सितंबर को चार्ज संभालने के बाद उन्होंने प्रबंधन की मनमानी पर कुछ सख्ती की है। पहले तो उनके कार्यालय में अनुबंध की प्रति तक नहीं थी। बाद में सख्ती दिखाने पर उन्हें अनुबंध की प्रति उपलब्ध कराई गई। उन्होंने कहा कि अस्पताल की मानीटरिंग करवाई जानी जरूरी है।
अनुबंध की शर्तों के आधार पर अस्पताल में 12 डॉक्टर होने जरूरी हैं। अल्ट्रासाउंड से एक्सरे तक सारी सुविधाएं मरीजों को मिलनी चाहिए, लेकिन पीपीपी मोड के अस्पताल से शिकायतें आ रही हैं। इसकी जानकारी महानिदेशालय को भी दी गई है।
चौखुटिया सीएचसी का हाल एक नजर में
एक साल से नहीं हुआ अल्ट्रासाउंड
चार माह पूर्व आए मशीन की पैकिंग तक नहीं खुली
एक साल से खराब खराब जनरेटर अब तक नहीं बदला
नेत्र सर्जन ने नहीं किया एक भी ऑपरेशन
विधायक मदन बिष्ट ने प्रबंधन की दी एक माह की मोहलत
तीन दिन में डाक्टरों के नाम, वेतन और डिग्रियों की प्रतियां मांगी
लोगों ने फूंका पीपीपी मोड का पुतला
सीएचसी को पीपीपी मोड से हटाने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। चांदीखेत के लोगों ने शनिवार को पीपीपी मोड का पुतला फूंका। उनका कहना था कि संचालकों के रवैये से स्पष्ट हो गया है कि उनकी रुचि व्यवस्था सुधारने के बजाए सिर्फ अपना बैलेंस बढ़ाने में है।