कुपित शिव ने किया था तांडव
मायापुरी में कनखल शीतला मंदिर में सती का जन्म हुआ था। यज्ञकुंड में दग्ध होने के बाद उनकी पार्थिव देह शिवगण वीरभद्र ने जिस स्थान पर रखी वह आज की मायादेवी है। यहीं से दग्ध देह को कंधे पर उठाकर कुपित शिव ने तांडव किया। सती की देह टूट टूटकर जहां-जहां गिरी वे ही स्थल आज 52 शक्ति पीठों के रूप में पूजे जाते हैं। शीतला मंदिर, सतीकुंड, माया देवी, चंडी देवी और मनसा देवी मंदिरों को मिलकर शक्ति के पांच ज्योतिर्थल बनते हैं। इनका केंद्र आदि पीठ मायादेवी के गर्भस्थल अर्थात पाताल में है ।
शक्ति की भांति शिव के भी पांच ज्योतिर्थल हैं जिनका केंद्र आकाश में है, ये हैं दक्षेश्वर, बिल्वकेश्वर, नीलेश्वर, वीरभद्र और नीलकंठ। पांच ज्योतिर्स्थलों का केंद्र नीलेश्वर और नीलकंठ से जुड़े ऊंचे कैलाश अर्थात आकाश पर है। शिव और शक्ति के ये दसों ज्योतिर केंद्र सावन के महीने में कांवड़ भरने आए शिव भक्तों पर दसों स्थलों से कृपा वृष्टि करते है। दसों स्थलों की कृपा होने पर ही शिवभक्त कांवड़ियों की गंगा यात्रा अपने अपने अभीष्ठ शिवालयों तक सकुशल संपन्न हो पाती है ।
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स्कंद पुराण केदारखंड के अनुसार श्रावण मास में हिमालय और शिवालिक पर्वतमालाओं का यह भूभाग शिव शक्ति और मां गंगा की कृपा से युक्त होकर जागृत हो उठता है। गंगा भक्तों पर बिन मांगे भी भगवान शिव कृपा वृष्टि करते हैं। हरिद्वार से निकलने वाली श्रावणी कांवड़ यात्रा सबसे बड़ी यात्रा मानी जाती है। कनखल में सती का मायका और भगवान शंकर की ससुराल है। मायापुरी स्थित मायादेवी मंदिर आदि शक्तिपीठ है। वीरभद्र ने यज्ञकुंड से निकाल कर सती की दग्ध देश इसी स्थान पर रखी थी।