इसे कुदरत का करिश्मा ही कहा जाएगा कि मानसिक रूप से विक्षिप्त संवासिनी का 12 साल पहले बिछड़े बेटे और परिजनों से मिलन होगा।
मिलने की आस छोड़ चुके परिवार को दून से गए फोन ने पंख लगा दिए है। तमिल भाषा नहीं समझने की वजह से संवासिनी को इतने बरस तक अपनों से दूर रहने का दर्द झेलना पड़ा है। नारी निकेतन के किसी अधिकारी और कर्मचारी ने उसकी भाषा समझने के बजाए उसे विक्षिप्त मानकर अनदेखा किया।
अमर उजाला के संवासिनी प्रकरण का खुलासा करने के बाद नारी निकेतन में बढ़ी सतर्कता की वजह से इस संवासिनी को नया जीवन मिलने जा रहा है। जब यह पता चली कि नारी निकेतन में एक संवासिनी तामिल बोलती है तो उत्तराखंड कैडर में तैनात एसटीएफ की एसएसपी पी रेणुका देवी को बुलाया गया।
एसएसपी ने न केवल उसकी भाषा समझी, बल्कि उसके परिवार को खोजकर बेटे से बात भी करा दी। तीन से चार दिन में बेटा दून पहुंचकर अपनी मां के दीदार करेगा। नारी निकेतन की संवासिनियों का दर्द जानने की कोशिश कभी नहीं हुई। सब कुछ होते हुए भी अधिकतर संवासिनी लावारिस की जिंदगी जीने का मजबूर हैं।
संवासिनियों की आकस्मिक मौतों पर शासन गंभीर हुआ तो समाज कल्याण से लेकर प्रशासन तक की नारी निकेतन में चहल कदमी बढ़ी है। बरसों से मानसिक रूप से विक्षिप्त मानकर जिस संवासिनी की भाषा को अनदेखा किया जा रहा था, उसी के सहारे बिछडे़ परिवार को तलाश लिया गया।
अधिकारियों की मौजूदगी में संवासिनी ने मुंह खोला तो वह समझ गए कि वो तमिल में बोल रही है। तमिलनाडु निवासी होने के कारण एसटीएफ की एसएसपी पी रेणुका देवी को उसकी भाषा समझने के लिए बुलाया गया। महिला अधिकारी ने काफी देर संवासिनी से गुफ्तगू की। बातचीत में संवासिनी के गांव के नाम का पता चल गया।
पी रेणुका देवी ने व्यक्तिगत रुचि लेते हुए तमिलनाडु के अधिकारियों से बात की तो सच सामने आता गया। एसएसपी ने संवासिनी की उसके बेटे से मोबाइल पर बात भी करा दी। बेटे से बात कर मां की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यह संवासिनी साल 2004 में गायब होकर कोटद्वार के नारी निकेतन पहुंची थी। वहां से उसे देहरादून के नारी निकेतन में शिफ्ट कर दिया गया था।
तमिलनाडु की संवासिनी 12 साल पहले गायब हो गई थी। बातचीत के आधार पर उसके परिजनों को खोज लिया गया है। बेटे के परिजनों के साथ तीन से चार दिन में दून पहुंचने की उम्मीद है। इसके बाद मां-बेटे का मिलन होगा।
- पी रेणुका देवी, एसएसपी एसटीएफ
ऑनलाइन होगा संवासिनियों का डाटा
मूक बधिर और घर-परिवार का पता बताने में असमर्थ संवासिनियों का डाटा ऑनलाइन किया जाएगा। इसके लिए जिला प्रशासन ने वेबसाइट का काम लगभग पूरा कर लिया है। जल्द ही मुख्यमंत्री हरीश रावत वेबसाइट को लांच करेंगे।
आमतौर पर मूक बधिर, मानसिक रूप से बीमार और भाषा समझ में नहीं आने से संवासिनियों के परिवारीजनों और उनके घर का पता नहीं चल पाता है। ऐसे में संवासिनियों को उनके परिजनों तक पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। नारी निकेतन समेत कुछ गैर सरकारी संस्थाओं में भी इस तरह की महिलाएं और युवतियां रह रही हैं।
इससे ये संवासिनियां अमूमन कई साल तक परिवार से दूर रहने को मजबूर हो जाती हैं। इसके अलावा नारी निकेतन में भी संवासिनियों की संख्या क्षमता से अधिक पहुंच जाती है। ऐसी संवासिनियों को उनके परिजनों से मिलाने की कोशिश के संबंध में जिला प्रशासन वेबसाइट तैयार कर रहा है। जिस पर संवासिनियों का पूरा डाटा मौजूद रहेगा।
भीख मांगने वाले बच्चों का भी होगा ब्यौरा
वेबसाइट में गुमशुदा लोगों, भीख मांगने वाले बच्चों, सड़क, रैन बसेरों, धार्मिक स्थलों के बाहर रहकर गुजर बसर करने वाले, बेसहारा लोगों की जानकारी भी वेबसाइट पर अपलोड की जाएगी। इनका हर संभव विवरण जुटाकर फोटो समेत वेबसाइट पर उपलब्ध रहेगा।
गुमशुदा बच्चों एवं अन्य लोगों को परिवार से मिलाने का यह एक प्रयास है। अगर कोई दावा करता है तो वैरिफिकेशन और अन्य कानूनी प्रक्रिया के तहत ही गुमशुदा को परिजनों के सुपुर्द किया जाएगा। क्राइम कंट्रोल के लिहाज से भी यह फायदेमंद है। अभी तक 30 लोगों का डाटा तैयार कर लिया गया है। वेबसाइट शीघ्र ही लांच की जाएगी।
- रविनाथ रमन, जिलाधिकारी