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अब गुदड़ी के लाल नहीं बन सकते ‘डॉक्टर’

Fri, 01 May 2015 03:21 PM IST
मनमीत रावत/ अमर उजाला, देहरादून
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देहरादून में मेडिकल सीटों की बिक्री का एक और मामला सामने आने के बाद यह साफ हो गया है कि उत्तरी भारत के किसी प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज या इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिल लेना है तो दून में ‘काउंटर’ खुले हैं।
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इन काउंटरों में बैठै सेल्समैन (दलाल) से डील कीजिये और जहां चाहें वहां दाखिला ले लें। हां, गुदड़ी के लालों के लिए ये काउंटर नहीं हैं। क्योंकि यहां पर हर सीट 50 लाख रुपए से करोड़ों तक बिकती है। सीटों के इस अवैध धंधे पर पुलिस भी चाहकर नकेल नहीं लगा पाई, जबकि इस सिंडिकेट में एक मंत्री के पीआरओ की भी हत्या हो चुकी है।

पूर्व में तफ्तीश कर चुके पुलिस अधिकारी ने बताया कि दून में यह काला धंधा प्रत्येक साल एक अरब रुपए से ऊपर जाता है। प्रापर्टी के बाद सबसे ‘फास्ट मनी’ इस धंधे में है। कॉलेज खुद दलालों को अपनी सीटें बेच देते हैं।
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सूत्रों के अनुसार, इन दलालों को बड़े सफेदपोशों की शह प्राप्त होती है। एसएसपी पुष्पक ज्योति बताते हैं कि इस बार स्पेशल टीम लगाकर गैंग के पूरे सिंडिकेट का पता लगाया जा रहा है। तेजतर्रार अधिकारियों को इस काम में लगाया गया है। कोई भी सफेदपोश हो या होई प्रोफाइल बख्शा नहीं जाएगा।

हर कॉलेज में केवल एक या दो सीटें
पीजी सीटों की कीमत करोड़ों में इसलिए भी होती है, क्योंकि एक कालेज में हर कोर्स में केवल दो से तीन ही सीटें होती हैं। किसी कॉलेज में न्यूरोसर्जन कोर्स की पीजी सीट केवल दो या तीन होती है।

ऐसे ही हर कोर्स में सीट सीमित होती है। वहीं उत्तराखंड में केवल दो सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, जहां पर केवल सरकारी कोटे वाले और प्रांतीय स्वास्थ्य सेवा से आए डॉक्टरों को पीजी कराया जाता है। उत्तर प्रदेश में भी काफी कम कॉलेज हैं। उधर, हर साल लाखों छात्र एमबीबीएस करते हैं जबकि पीजी सीटें बेहद कम होती हैं।

इसलिए चौखा है ये धंधा

- नार्थ इंडिया के अधिकांश मेडिकल कॉलेजों की अगले 10 सालों की सीटें ये दलाल खरीद लेते हैं। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2025 की एमबीबीस की कुछ सीटें वर्ष 2015 में खरीदी जाती हैं।

ये सीट दलाल को लगभग 15 लाख की पड़ेगी। उसके बाद कुछ सीटें वो 2025 की 2016 में खरीदेगा। ऐसा करते-करते वो अधिकांश सीटें वर्ष 2024 तक खरीद लेगा।

उसके बाद वर्ष 2025 में वो मौजूदा साल में खरीदी हुई प्रत्येक सीट को 35 से 40 लाख रुपए में बेचेगा। सूत्रों के अनुसार, आखिरी की सीटों की तो नीलामी तक होती है। हर साल की सीट कई साल पहले से खरीदी जाती रही हैं।

इसलिए भी बिकती हैं सीटें
एमबीबीएस करने बाद लगभग दो या तीन साल की तैयारी कर पीजी एग्जाम निकलता है। पीजी एग्जाम के बाद अमूमन दो तरह के कोर्स होते हैं। एक क्लीनिकल और दूसरी नान क्लीनिकल पीजी। साल खराब न हो, इसलिए अधिकांश मेधावी एमबीबीएस डॉक्टर रुपए देकर पीजी सीट खरीदना पसंद करते हैं।

पीजी की सीटें करोड़ों में होती हैं। लेकिन एक बार सीट खरीदने के बाद कम से कम पढ़ाई के दौरान ही स्टाइपेंड (मानदेय) लगभग 50 हजार रुपए होता है और उसके बाद वेतन लाखों में। इसलिए पीजी सीटों की डिमांड भी जबरदस्त होती है।
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मेडिकल में सीट दिलाने का मामला

मेडिकल कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट सीट दिलाने के नाम पर लाखों रुपए ठगने वाले आरोपितों के बैंक खाते सीज होंगे। वहीं पुलिस तफ्तीश में कुछ सफेदपोशों के चेहरे भी सामने आए हैं। पुलिस ये भी तफ्तीश कर रही है कि मेडिकल कॉलेजों में किस-किस से गैंग के सदस्यों की पहचान थी।

उधर, एसएसपी ने पुलिस पर लगे आरोपों की जांच भी इंस्पेक्टर महेश चंद्र जोशी को सौंपी है। पुलिस पर आरोप लगे थे कि जो राशि होटल में आरोपितों से बरामद हुई थी, पुलिस ने उसमें गड़बड़ी कर अधिकारियों को कम दिखाई। बुधवार को नेहरू कॉलोनी थाना पुलिस और एसओजी ने चार ठगों को मेडिकल पीजी सीट बेचने की डील करते हुए दबोचा था।

हालांकि, पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे थे कि मौके पर चार नहीं बल्कि पांच ठग थे और बरामद की गई रकम करीब 35 लाख रुपये थी, इसे पुलिस ने एक लाख दर्शाया था। ऐसे में सवाल यह है कि पांचवां ठग और बाकी की रकम कहां गई। गुरुवार को एसएसपी ने पकडे़ गए चारों आरोपितों के बैंक खाते सीज करने के आदेश दिए।

एसएसपी पुष्पक ज्योति ने बताया कि डील के रुपए संभवता बैंक खातों में जमा किए गए होंगे। बैंक ट्रांजेक्शन भी देखी जाएगी। उधर, पुलिस पर लगे आरोपों की भी तफ्तीश कराई जा रही है।

सूत्रों के अनुसार, पुलिस पूछताछ में आरोपितों ने अपने एक साथी के अलावा, कुछ सफेदपोशों के नाम भी उगले हैं। ये वो सफेदपोश है जो इनके लिए लांबिग का काम करते हैं। एसपी सिटी अजय सिंह ने बताया, पुलिस हर स्तर की जांच कर रही है।
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