देहरादून में मेडिकल सीटों की बिक्री का एक और मामला सामने आने के बाद यह साफ हो गया है कि उत्तरी भारत के किसी प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज या इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिल लेना है तो दून में ‘काउंटर’ खुले हैं।
इन काउंटरों में बैठै सेल्समैन (दलाल) से डील कीजिये और जहां चाहें वहां दाखिला ले लें। हां, गुदड़ी के लालों के लिए ये काउंटर नहीं हैं। क्योंकि यहां पर हर सीट 50 लाख रुपए से करोड़ों तक बिकती है। सीटों के इस अवैध धंधे पर पुलिस भी चाहकर नकेल नहीं लगा पाई, जबकि इस सिंडिकेट में एक मंत्री के पीआरओ की भी हत्या हो चुकी है।
पूर्व में तफ्तीश कर चुके पुलिस अधिकारी ने बताया कि दून में यह काला धंधा प्रत्येक साल एक अरब रुपए से ऊपर जाता है। प्रापर्टी के बाद सबसे ‘फास्ट मनी’ इस धंधे में है। कॉलेज खुद दलालों को अपनी सीटें बेच देते हैं।
सूत्रों के अनुसार, इन दलालों को बड़े सफेदपोशों की शह प्राप्त होती है। एसएसपी पुष्पक ज्योति बताते हैं कि इस बार स्पेशल टीम लगाकर गैंग के पूरे सिंडिकेट का पता लगाया जा रहा है। तेजतर्रार अधिकारियों को इस काम में लगाया गया है। कोई भी सफेदपोश हो या होई प्रोफाइल बख्शा नहीं जाएगा।
हर कॉलेज में केवल एक या दो सीटें
पीजी सीटों की कीमत करोड़ों में इसलिए भी होती है, क्योंकि एक कालेज में हर कोर्स में केवल दो से तीन ही सीटें होती हैं। किसी कॉलेज में न्यूरोसर्जन कोर्स की पीजी सीट केवल दो या तीन होती है।
ऐसे ही हर कोर्स में सीट सीमित होती है। वहीं उत्तराखंड में केवल दो सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, जहां पर केवल सरकारी कोटे वाले और प्रांतीय स्वास्थ्य सेवा से आए डॉक्टरों को पीजी कराया जाता है। उत्तर प्रदेश में भी काफी कम कॉलेज हैं। उधर, हर साल लाखों छात्र एमबीबीएस करते हैं जबकि पीजी सीटें बेहद कम होती हैं।