इस काम के लिए होता है साल के बीजों का इस्तेमाल
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में हजारों वर्षों से पित्त, ल्यूकोरिया, गोनोरिया, त्वचा रोग, पेट संबंधी विकार, अल्सार, घाव, दस्त और कमजोरी के इलाज में साल के बीज का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा चॉकलेट बनाने में भी साल के बीजों का प्रयोग किया जाता है।
इससे निकलने वाले तेल का नहीं है कोई तोड़
साल के बीजों से बहुमूल्य खाद्य तेल निकाला जाता है। बीज में 19-20 प्रतिशत तेल होता है। तेल का उपयोग मक्खन के विकल्प के रूप में और मिष्ठान्न और खाद्य पदार्थों में भी किया जाता है। तेल निकालने के बाद बची खली में 10-12 प्रतिशत प्रोटीन होता है। इसका उपयोग मुर्गियों के लिए चारे के रूप में किया जाता है।
कई राज्यों में बहुत पहले से किया जा रहा है इनका प्रयोग
देश में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड ऐसे राज्य हैं, जहां बड़े पैमाने पर साल के बीजों को प्रमुख वनोपज के तौर पर लघु वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से इकट्ठा करवाया जाता है। इन राज्यों में साल के बीजों का हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी जारी किया जाता है।
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उत्तराखंड में पहली बार पायलट प्रोजेक्ट के रूप में साल के बीजों को वनोपज के रूप में इकट्ठा किया जा रहा है। हालांकि इस बार बारिश के चलते बीजों को एकत्र किए जाने का अधिक समय नहीं मिल पाया। इस काम में इस बार केवल वन कर्मियों को ही लगाया गया था। कितने बीज इकट्ठा हुए हैं, डिविजनों से आंकड़ें आने बाकी हैं। अगले साल से वृहद स्तर पर इस योजना पर काम किया जाएगा। - मनोज चंद्रन, मुख्य वन संरक्षक, वन विभाग