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वे भागे थे सपनों की दुनिया बसाने, लेकिन...

Fri, 23 Jan 2015 06:56 PM IST
विनय बहुगुणा/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
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मेरे पिता हर रोज शराब के नशे में मां के साथ गाली-गलौज करते हैं। मां पर हाथ उठाते और उसे गंदी गाली देते हैं। मां रोती है तो मेरे भी आंसू निकल आते थे। मैं डर के कारण कुछ नहीं बोल पाता था।
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ऐसे हालातों मैं घर में घुट सा रहा था। ऐसे में मैंने घर से भागना उचित समझा। ये शब्द घर से भागे उसे बच्चे के हैं, जो अपने साथियों के साथ श्रीनगर में बरामद हुआ।

एक बच्चा घर में होती रोज की चिकचिक से परेशान होकर सुकून की तलाश में घर छोड़ता है, तो वहीं दूसरा बच्चा अपनी उपेक्षा के चलते दूर जाना मुनासिब समझता है।

तीसरा बच्चा पढ़ना नहीं चाहता, जबकि चौथा बच्चा मेधावी है। वह मोबाइल संचालन में माहिर है। वह जल्द से जल्द पैसा कमाना चाहता है। वह घर से इसलिए भागा, क्योंकि 14 वर्ष पहले उनके गांव का एक लड़का घर से भागा था। जब वह लौटा तो अपने साथ लाखों रुपये लाया। वह कहता है कि मैं भी लाखों रुपये कमाना चाहता हूं।
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चार की चार अलग कहानियां, रास्ता एक

चारों बच्चों की कहानियां बिल्कुल अलग-अलग है, लेकिन चारों को घर से भागने का एक जैसा रास्ता सूझता है। वे समझते हैं कि शायद ऐसा कर वे अपने सपनों की दुनिया बसा सकेंगे। बेशक ये उनकी नादानी हो सकती है, लेकिन जब जीवन को सींचने के लिए अनुकूल वातावरण न मिले तो ऐसे कदम उठाना ही उन्हें लाजिमी लगता है।

अपने सपनों को आकार देने के लिए कक्षा सात से नौंवी तक पढ़ने वाले ये बच्चे 21 जनवरी को घर से भागे। गांठ में पैसे नहीं थे। श्रीनगर तक ही पहुंच पाए कि पुलिस ने उन्हें घर पहुंचा दिया। पुलिस अधीक्षक बीजे सिंह कहते हैं कि बच्चों की सोच, कई सवाल खड़े कर रही है, जिस पर माता-पिता को गंभीर होना होगा। बच्चों को उचित वातावरण और उनके मनोविज्ञान को भी समझने की जरूरत है।  

मनोविज्ञानियों का कहना
घरों का माहौल बच्चों के दिल और दिमाग पर गहरा असर करता है। छोटी सी उम्र से बच्चों को मोबाइल सहित अन्य सुख-सुविधाएं देना और कई बार उनके मन की न होने पर वे घर से भागने की सोच लेते हैं।
-अजरा परवीन, प्रोफेसर मनोविज्ञान पीजी कालेज हल्द्वानी
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