उत्तराखंड सरकार ने अपने एक मंत्री के भाई को मलाईदार पोस्टिंग देने के लिए आबकारी विभाग का ढांचा बदल डाला।
तर्क दिया गया कि राजस्व बढ़ाने के लिए ढांचा बदला। लेकिन मैदानी जिलों में तो राजस्व पहले ही लक्ष्य से आगे है। यही नहीं, अब फील्ड में दो उपायुक्त कार्यालय होंगे, स्टाफ होगा और सरकारी खजाने पर करारी चोट लगेगी।
यूपी के कानपुर, गाजियाबाद, मेरठ, लखनऊ, गोरखपुर जैसे बड़े जिलों में भी सहायक आबकारी आयुक्त जिले चलाते हैं। लेकिन राज्य में पदोन्नति पाकर जिलों से हटे सहायक आयुक्तों को मुख्यालय में सुकून नहीं मिला। इनमें एक अधिकारी मंत्री के भाई है।
केवल इसीलिए देहरादून व हरिद्वार को मिलाकर एक आबकारी डिवीजन बनेगा ताकि इन महाशय का दो जिलों पर सीधा नियंत्रण रहे। कोई उंगली ना उठाए इसलिए नैनीताल-यूएसनगर को बनाकर भी एक डिवीजन बनेगा। कैबिनेट बैठक में एक मंत्री ने इसकी वजह पूछी तो किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
लेकिन ढांचा स्वीकृत हुआ और उपायुक्त के मात्र दो पद बढ़ाए गए। इसके पीछे राजस्व बढ़ाने का तर्क दिया गया। जबकि मैदानी जिले तो राजस्व में लक्ष्य से भी आगे है। और, अब दोनों डिवीजन में उपायुक्त के कार्यालय खोलकर लाखों रुपये महीना पानी की तरह बहाए जाएंगे।
कार्यालय खुलेगा, स्टाफ की तैनाती होगी, कार्यालय संचालन में मोटा खर्च होगा। जिसकी जरूरत भी नहीं है। पूरा महकमा विरोध करता रहा लेकिन सवाल मंत्री के भाई का था। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी इस मामले में वही किया जो बहुगुणा करना चाहते थे, लेकिन फर्क इतना था कि तब हरीश इस कृत्य के विरोध में थे।