स्वास्थ्य विभाग में संविदा फार्मेसिस्ट के 600 पदों पर भर्ती का ऐलान कर सरकार बेरोजगारों को चुनावी झुनझुना तो नहीं पकड़ा रही है?
यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि भर्ती प्रक्रिया में ऐसे प्रावधान किए गए हैं, जो नियमानुसार ठीक नहीं हैं। कोर्ट से भी संविदा नियुक्ति के मामलों में सरकार को पहले भी झटका लग चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकार चुनाव से पहले ऐसी चूक दोबारा क्यों कर रही है?
सरकार संविदा फार्मेसिस्टों के 600 पदों पर मेरिट और इंटरव्यू के जरिये भर्ती करने जा रही है। जबकि केंद्र और राज्य सरकार में समूह ग की किसी भी नौकरी के लिए इंटरव्यू पहले ही समाप्त किया जा चुका है।
ऐसे में इंटरव्यू के जरिये चयन की वैधानिकता सवालों के घेरे में हैं। सरकार इसी तरह भर्ती किए गए गेस्ट टीचरों के मामले में भी कोर्ट से झटका खा चुकी है। कोर्ट ने केवल मेरिट के आधार पर भर्ती को गलत बताते हुए उन्हें हटाने के निर्देश दिए थे। साफ है कि सरकार मनमानी करते हुए भर्ती करती भी है तो इसे कोर्ट में आसानी से चैलेंज किया जा सकता है।
सूत्रों की मानें तो सियासी दबाव के चलते संविदा फार्मेसिस्टों की भर्ती के मानक तय किए गए हैं। कोई भी अधिकारी भर्ती प्रक्रिया को लेकर निर्धारित मानकों पर बोलने को तैयार नहीं है। हालांकि नाम न छपने की शर्त पर अधिकारी कबूल रहे हैं कि प्रक्रिया में मानकों की अनदेखी हुई है।
उधर, इस संबंध में स्वास्थ्य मंत्री से संपर्क साधने के कई प्रयास किए गए लेकिन उनसे बात नहीं हुई। जब भी उनका इस प्रकरण को लेकर पक्ष आएगा उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
सबसे ज्यादा फीस
संविदा फार्मेसिस्ट के पदों पर आवेदन के लिए बेरोजगारों को एक हजार रुपये शुल्क देना पड़ रहा है। जानकारों के अनुसार राज्य गठन के बाद किसी भी भर्ती में वसूला यह सबसे ज्यादा शुल्क है। जबकि इससे पहले एक बार सरकारी नौकरियों में आवेदन को मुफ्त किया जा चुका है। एसटी-एससी अभ्यर्थियों से पांच सौ रुपये आवेदन शुल्क लिया गया है।
आरक्षण तय नहीं
600 पदों पर भर्ती के लिए सरकार ने विज्ञप्ति तो जारी की लेकिन इसमें आरक्षण की स्थिति स्पष्ट नहीं है। एसटी-एससी, ओबीसी, महिला, भूतपूर्व सैनिक समेत अन्य श्रेणियों में कितने पद भरे जाएंगे, यह तय नहीं है। नियमानुसार नियुक्ति से पहले पदों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।