रायपुर की छोटी नहर में गुरुवार को आरपीजी (रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड) बम का खोखा मिलने की खबर से अफरातफरी मच गई। बम निरोधक दस्ते ने जांच पड़ताल के बाद उसे खोखा करार दिया। बताया गया है कि फायरिंग अभ्यास के दौरान आर्मी ने इसका इस्तेमाल किया गया होगा।
रायपुर क्षेत्र में आबादी के बीच से निकल रही छोटी नहर के पानी में गुरुवार दोपहर एक विस्फोटक मिलने की खबर से रायपुर पुलिस ने मौके पर पहुंचकर घटनास्थल की घेराबंदी करा दी। कुछ देर बाद बम निरोधक दस्ते के सब इंस्पेक्टर मुकेश कुमार अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे। उन्होंने जांच में पाया कि यह आरपीजी बम का पिछला हिस्सा है। माना जा रहा है कि यह अभ्यास के दौरान चलाया गया होगा। इसे रॉकेट लांचर से चलाया जाता है। पास ही में आर्मी का ट्रेनिंग सेंटर है, जहां पर ट्रेनिंग के दौरान आर्मी इसका इस्तेमाल करती है।
तीसरी आंख से भी नहीं लगा
ओल्ड मसूरी रोड पर बरामद हुए द्वितीय विश्व युद्ध के 40 कारतूस फेंकने वाले के बारे में सीसीटीवी फुटेज से भी कोई सुराग नहीं मिल सका। पुलिस जांच में आया है कि बरामद कारतूस 1943 की आयुध फैक्ट्री से संबंधित हैं। उस समय .30 बोर का लाइसेंस भारत सरकार द्वारा जारी किया जाता था।
राजपुर पुलिस ने बुधवार रात ओल्ड मसूरी रोड पर 40 कारतूस बरामद किए थे। प्रारंभिक जांच में बरामद कारतूस दूसरे विश्व युद्ध के होने की जानकारी मिली। पुलिस ने कारतूस फेंकने वाले की पहचान करने के लिए पूरी ताकत झाेंक रखी है। आसपास रहने वाले लोगों के अलावा सीसीटीवी फुटेज का भी अवलोकन किया जा रहा है। एसओ नत्थीलाल उनियाल ने बताया कि फुटेज से अभी तक किसी तरह का सुराग नहीं लगा है। कारतूसों पर डब्लूसीसी -1943 लिखा है। यह कारतूस उस समय की एक आयुध फैक्ट्री से संबंधित प्रतीत हो रहे हैं। .30 का बोर बरसों पहले चलता था। इसका लाइसेंस केन्द्र सरकार की तरफ से जारी होता था। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी के पास बरसों से यह कारतूस जमा थे। किसी तरह की कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए इन्हें मसूरी रोड पर फेंका गया है।