चीन सीमा के साथ सड़कों के निर्माण में देरी जहां सामरिक दृष्टि से नुकसानदायक है, वहीं उत्तराखंड को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
लिपुलेख दर्रे तक नहीं बन पाई सड़क
सड़कों की खराब स्थिति के कारण ही मानसरोवर यात्रा के लिए नया मार्ग नाथुला दर्रे (सिक्कम) से खोला जा रहा है। इतना ही नहीं व्यापार मार्ग खुलने के 53 बाद भी पिथौरागढ़ के लिपुलेख दर्रे तक सड़क नहीं बन पाई। इसका भी सेना और उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति को नुकसान हो रहा है।
रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमांत सड़कों के बनने में देरी से बार्डर असुरक्षित है। चीन मामलों के विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल एमसी भंडारी मानते हैं कि मानसरोवर यात्रा रूट का जहां धार्मिक महत्व है वहीं यह सड़क सामरिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
आज तक उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे तक सड़क नहीं बन सकी वहीं सीमा के दूसरी तरफ चीन के रोड, रेलमार्ग, हेलीड्रम, हवाई पट्टी और आयल डिपो तक बन गए हैं। जनरल भंडारी ने कहा कि सीमांत सड़कों के लिए केंद्र और राज्यों में बेहतर समन्वय बेहद जरूरी है।
दर्रों तक सड़कें नहीं सेना की चिंता
1962 में हुए चीन युद्ध के बाद दोनों देशों में पारंपरिक व्यापार मार्ग बंद कर दिए थे, जिसे 1981 में खोला गया। लिपुलेख दर्रे से तिब्बत के साथ व्यापार दोबारा शुरू हुआ, लेकिन अभी तक वहां सड़क नहीं बनी है।
जबकि चीन ने दूसरी तरफ सड़कों का जाल बिछा दिया है। इसके अलावा लिपुलेख से नीति पास के बीच 12 दर्रें है जहां चीन अपनी सड़क मार्ग पहुंचा चुका है।
केंद्र राज्य दोनों जिम्मेदार
जनरल भंडारी का कहना है कि चीन सीमा तक सड़कों को नहीं बनाने की केंद्र की रणनीति का परिणाम यह है कि आज सेना को वहां पहुंचने के लिए कठिनाइयों से जूझना पड़ रहा है।
वर्ष 2007 में सीमांत सड़कों पर जोर देने का फैसला हुआ लेकिन उसके बाद भी सड़क निर्माण में वन, पर्यावरण आदि की अड़चनें आ रही हैं। 15 बरस में राज्य सरकार भी सीमांत सड़कों पर कोई तेजी के प्रयास के बजाए केंद्र से आरोप प्रत्यारोप में उलझे रहे।
मानसरोवर यात्रा का फायदा नेपाल को
उत्तराखंड सरकार भले अपने मानसरोवर रूट की पैरवी करती रही, लेकिन वहां आठ से दस दिन का पैदल ट्रैक बड़ी दिक्कत है। इस धार्मिक पर्यटन का फायदा नेपाल को हुआ है, जहां से मनसरोवर यात्रा बेहद सुगम है। अब नाथू ला दर्रा खुलने से उत्तराखंड की स्थिति और खराब होगी।