ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों के पिघलने से उद्गम स्थल से ही नदियों का पानी भारी हो रहा है। पारिस्थितिकी में सूक्ष्म स्तर पर आ रहे बदलाव के साथ चट्टानों का क्षरण भी हो रहा है। इससे पानी में अधिक मात्रा में चूना और आयरन जैसे तत्व बढ़ रहे हैं। ग्लेशियर क्षेत्रों में आ रहे इस बदलाव के कारण पानी के साथ गाद भी अधिक बहकर आ रही है जिससे नदियों की मुख्य धारा के भरने का खतरा है। इससे हिमालय क्षेत्र की नदियों की धारा बदल सकती है।
वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने नदियों के पानी की जांच की तो इसमें रेत और खनिज तत्वों की मात्रा सीमा से अधिक पाई गई। चट्टानों से निकले कण पानी के संपर्क में आ रहे हैं। इसका असर नदियों के किनारे चल रही बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं पर पड़ा है। शोध में जल विद्युत परियोजनाओं की टरबाइनें खराब पाई गई हैं। खासतौर पर पानी की केमिस्ट्री में बदलाव देखा गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह पानी मानव, वन्य जीव और नदियों किनारे चल रहे उद्योग-धंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
ग्लेशियर के कचरे और चट्टानों के क्षरण की वजह से अकेले मंदाकिनी नदी की चौड़ाई पांच गुना बढ़ गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इसी तरह गाद की मात्रा बढ़ती रही तो नदियां छिछली हो जाएंगी जिससे बारिश में बाढ़ का फैलाव क्षेत्र बढ़ जाएगा। इससे नदी किनारे बसी आबादी भी प्रभावित हो सकती है। आशंका यह भी है कि बिना शोधन किए यह पानी पीने से स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
‘ग्लेशियरों के गलने से नदियों के जल में गाद और हानिकारक तत्वों की मात्रा बढ़ रही है। इससे पानी की केमिस्ट्री बदलेगी। जिस तरह की चट्टानों का क्षरण होगा उसके कण पानी में भी आएंगे। गाद से नदियों की मुख्य धारा पर असर भी पड़ेगा।’
- डॉ. अमित कुमार (वरिष्ठ वैज्ञानिक, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान)