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सूचना के अधिकार से पकड़ा गया 'सीएम' का झूठ

Sat, 05 Oct 2013 07:46 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में सीएम कार्यालय पर गलत जानकारी देने पर जुर्माना लगाया गया है।
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यह गलत जानकारी सीएम कार्यालय ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत दून निवासी जयपाल रावत को दी है। इसके अलावा सीएम कार्यालय से अपीलार्थी को अन्य बिंदुओं की भी जानकारी नहीं दी गई।

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इस पर राज्य सूचना आयोग ने मुख्यमंत्री कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) पर 10 हजार रुपए जुर्माना लगाया है। आयोग का मानना है कि पीआईओ ने प्रदेश की कार्यदायी संस्थाओं के बारे में जानकारी देने में आनाकानी की और गलत सूचना दी।
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आयोग के इस फैसले से यह भी साफ हुआ कि प्रदेश में बाहर की कार्यदायी संस्थाओं को काम देने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है जबकि प्रदेश की कार्यदायी संस्थाओं के पास पर्याप्त काम नहीं है। दून निवासी जयपाल ने मुख्यमंत्री कार्यालय से पूछा था कि प्रदेश में कौन-कौन सी कार्यदायी संस्थाएं हैं और इनको कितना काम दिया गया है।

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पिछले एक साल से चल रहा मामला आयोग पहुंचा तो आयोग ने मुख्यमंत्री कार्यालय से प्रदेश की कार्यदायी संस्थाओं से संबंधित शासनादेश मांगे। इस पर कहा गया कि एक से अधिक लोक प्राधिकारियों को सूचना देने के लिए नहीं कहा जा सकता।

नियोजन विभाग ने शासनादेश उपलब्ध कराए
इस पर आयोग ने उक्त पीआईओ को कोर्ट में उपस्थित होने के कहा, पर पीआईओ कोर्ट में भी नहीं आए। वहीं, मुख्यमंत्री कार्यालय की बजाय नियोजन विभाग ने यह सारे शासनादेश अपीलार्थी को उपलब्ध कराए। राज्य सूचना आयुक्त विनोद नौटियाल ने मामले की सुनवाई करते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय को गलत सूचना देने का दोषी पाया।

आयुक्त का यह भी कहना है कि सूचना देने के बजाय इस मामले को भटकाने की कोशिश की गई। आरटीआई नियमावली का हवाला देकर गलत तरीके से सूचना देने से बचने का प्रयास किया गया। आयोग ने नियोजन विभाग से उपलब्ध कराए गए शासनादेश अपीलकर्ता को उपलब्ध कराए।

कार्यदायी संस्थाओं के नाम पर खेल
आरटीआई के इस मामले से सरकार की मंशा पर भी सवाल उठा है। 2005 से लेकर 2013 तक सरकार ने कार्यदायी संस्थाओं को लेकर कई बार फैसलों को बदला। यूपी निर्माण निगम को एक-एक साल करके लगातार काम दिया जा रहा है।

प्रदेश की पीडब्ल्यूडी, अवस्थापना निर्माण निगम, जेएमवीएन, केएमवीएन, आरईएस आदि संस्थाओं की अनदेखी कर बाहर की एजेंसियों को काम दिया जाता रहा। केदारनाथ पुनर्निर्माण में भी बाहर की ही कंपनी ईपीआईएल को काम सौंपा गया जबकि प्रदेश की कार्यदायी संस्थाओं की उपेक्षा कर दी गई।

सबसे अधिक सवाल उत्तर प्रदेश निर्माण निगम पर की जा रही मेहरबानी पर उठ रहे हैं। पहले तय किया गया कि इस निगम को 2007 तक काम दिया जाएगा। जबकि हर साल यह तिथि बढ़ती ही रही।
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आयुक्त ही कटघरे में
इस मामले से यह भी साफ हुआ कि आरटीआई को लेकर संवेदनशीलता नहीं बरती जा रही है। सूचना देने के बजाय मुख्यमंत्री कार्यालय ने मामले की सुनवाई कर रहे आयुक्त को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। लोक सूचना अधिकारी ने आयुक्त को ही पूर्वाग्रह से ग्रसित बता यह तक कहा कि मामले की सुनवाई मुख्य सूचना आयुक्त करें। कहा गया कि संबंधित आयुक्त मुख्यमंत्री कार्यालय पर जुर्माना लगाने का बहाना खोज रहे हैं।

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