करम राम कहते हैं, ‘सचिवालय में नियुक्ति पाने के बाद कर्मचारी स्वत: स्फूर्त सचिवालय संघ का सदस्य हो जाता है। ऐसे में उसकी सदस्यता खत्म करने की बात समझ से बाहर है।’
संयुक्त सचिव चंद्र बहादुर जो 20 कर्मचारियों में शामिल हैं, कहते हैं, ‘उत्तराखंड सचिवालय संघ ने उत्तराखंड जनरल ओबीसी इंप्लाइज एसोसिएशन के आंदोलन का समर्थन करना संघ के संविधान का उल्लंघन नहीं है।
जबकि संघ के संविधान की धारा तीन में स्पष्ट है कि वह सभी कर्मचारियों में समन्वय और सामंजस्य बनाकर चलेगा। क्या सचिवालय संघ किसी वर्ग विशेष की मांग को लेकर अपना समर्थन दे सकता है।’ ऐसा अंदेशा है कि यह लड़ाई सचिवालय तक सीमित नहीं रहेगी। इसके जिला, ब्लाक और तहसील स्तर के दफ्तरों तक पहुंचने का खतरा है।
इतना ही नहीं कर्मचारी मसलों की ये लड़ाई अब प्रमोशन और नौकरी में आरक्षण के विरोध से आगे एक सामाजिक संघर्ष तब्दील होती दिख रही है। उत्तराखंड जनरल ओबीसी इंप्लाइज एसोसिएशन ने आंदोलन में सामाजिक संगठनों का समर्थन मांगा है। इससे पहले एससी एसटी इंप्लाइज फेडरेशन की महारैली में दोनों वर्गों से जुड़े सामाजिक संगठन शिरकत कर चुके हैं।