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कितनी अविरल और पवित्र है गंगा, जानें...

Mon, 07 Jul 2014 05:12 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
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गंगा की अविरलता और पवित्रता को लेकर इन दिनों तमाम चिंताओं और कोशिशों के बीच राहत भरी खबर है।
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केंद्रीय जल आयोग की जांच रिपोर्ट के मुताबिक उद्गम स्थल गोमुख से ऋषिकेश तक गंगाजल पीने योग्य है। यहां से हरिद्वार तक गंगाजल से स्नान करने में कोई दिक्कत नहीं है।

बावजूद इसके कि उत्तरकाशी से लेकर हरिद्वार तक जगह-जगह गंगा में बड़ी मात्रा में गंदगी समाहित हो रही है।

इसी महीने आई रिपोर्ट के मुताबिक कमजोर मानसून के चलते पहाड़ों पर बारिश की कमी से गंगा जल में बैक्टीरिया की संख्या बढ़ रही है, लेकिन यह अभी तय मानक के भीतर ही है।
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गंगाजल में स्नान करने में कोई दिक्कत नहीं

यह तथ्य आयोग के मानीटरिंग स्टेशनों पर लिए गए गंगा जल के सैंपल की जांच में सामने आया है। आयोग के विशेषज्ञों के मुताबिक इससे फिलहाल कोई समस्या नहीं है।

हरिद्वार से लिए गए सैंपलों की जांच के बाद आयोग के विशेषज्ञों ने कहा है यहां गंगाजल में स्नान करने में कोई दिक्कत नहीं है। ऐसी ही रिपोर्ट उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानीटरिंग स्टेशनों ने दी है।

आयोग के विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा जल में अभी मिट्टी की मात्रा अधिक नहीं बढ़ी है। बारिश बढ़ने पर मिट्टी की मात्रा बढ़ जाती है। नदी में पानी बढ़ने पर बैक्टीरिया का घनत्व घट जाता है।

गंगाजल की स्थिति

गंगाजल में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी)
उत्तरकाशी- 1.1 मिली ग्राम प्रति लीटर
ऋषिकेश- 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर
हरिद्वार- 2.5 मिली ग्राम प्रति लीटर
उन्नाव- 18 मिली ग्राम प्रति लीटर
कानपुर- 20 मिली ग्राम प्रति लीटर
(प्रदूषण के लिहाज से यह स्थिति घटती-बढ़ती रहती है)

जल में बैक्टीरिया की संख्या के लिहाज से बायोलोजिकल आक्सीजन डिमांड घटती-बढ़ती रहती है। बैक्टीरिया की संख्या बढ़ने पर बीओडी बढ़ जाएगी।

ऋषिकेश के बाद गंगा में नालों का पानी मिलने से थोड़ी दिक्कत आती है। क्वालिटी पर फर्क पड़ता है। लेकिन स्थिति खराब नहीं है। मानीटरिंग स्टेशनों पर लगातार जांच होती रहती है। हरिद्वार में बीओडी बढ़ जाती है।
- विनोद सिंघल, सदस्य सचिव उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

गंगाजल में कुछ तो है खास

केंद्रीय जल आयोग की जांच रिपोर्ट में गंगाजल में बैक्टीरियोफाजिल्स (सूक्ष्म गंगा प्रहरी) के होने की बात सामने आती रही है।

117 साल पहले फ्रांस के ‘पासचर इंस्टीट्यूट’ में हुई रिसर्च में भी इसी बैक्टीरियोफाजिल्स की मौजूदगी सामने आई थी। गंगा का यह सूक्ष्म प्रहरी सदियों से निरंतर सड़न पैदा करने वाले कीटाणुओं से लड़कर उन्हें नष्ट कर रहा है।

इसके कारण गंगा की पवित्रता तमाम प्रदूषण के बाद भी बरकरार है। पहाड़ी क्षेत्र के कम तापमान और पानी की शुद्धता से बैक्टीरियोफाजिल्स की पैदावार बढ़ जाती है।

पर्वतीय इलाकों की कुछ खास वनस्पतियां भी इसमें मददगार हैं। मैदानी इलाकों का माहौल बैक्टीरियोफाजिल्स के अनुकूल नहीं होता। जल में केमिकल मिलने की वजह से भी ये पनप नहीं पाते।
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अन्य नदियों की अपेक्षा जल काफी शुद्ध

18 वीं सदी में फ्रांसीसी वैज्ञानिक हैनबरी हैकिन ने गंगा जल के नमूने और फ्रांस के ‘पासचर इंस्टीट्यूट’ में इनकी जांच की थी।

जांच के परिणामों की उन्होंने एक रिपोर्ट तैयार की। इसे 1894 में ‘इंडियन मेडिकल कांग्रेस’ के सेमिनार में रिपोर्ट को पढ़ा था। इसमें बताया कि गंगा जल अन्य नदियों की अपेक्षा अधिक शुद्ध है।

इसमें कुछ ऐसे तत्व (बैक्टीरियोफाजिल्स) हैं, जिनमें कीटाणुओं को नष्ट कर देने की शक्ति है। यदि जल को गर्म कर दिया जाए तो यह शक्ति कम हो जाती है।

परीक्षण में गंगा और कुएं के जल को लिया गया। 100 एमएल गंगाजल में 5500 बैक्टीरिया डाले गए, तीन घंटे में ही ये कीटाणु पूरी तरह से साफ हो गए।

जबकि कुएं के पानी में कीटाणु लगातार बढ़ते गए। नदी में प्रवाहित किए जाने वाले मुर्दे के पास भी सैंपल लिए गए। शोध में पाया गया मुर्दे के खतरनाक बैक्टीरिया को भी गंगा जल ने नष्ट कर दिया।
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