10 अप्रैल वर्ष 1943 को मेरठ में सीआईडी सुप्रिटेंडेंट पद्म सिंह ने घेराबंदी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 10 दिन तक बरेली की कोतवाली में उनसे पूछताछ की गई। इसके बाद जेल भेज दिया गया। जेल के भीतर भी उन्होंने देश की आजादी के लिए संघर्ष जारी रखा। वहां बंद कैदियों को उन्होंने आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा दी।
जेल से छूटने के बाद वह फिर से आजादी की लड़ाई में कूद पड़ीं। इसके बाद कई बार गिरफ्तार और रिहा हुईं। उन्होंने जो सपना देखा था वह 15 अगस्त 1947 को पूरा हुआ और देश आजाद हो गया। उस समय वह इलाहाबाद में थीं। इसके बाद अपनी बड़ी बेटी किरण कौशिक के साथ रुड़की में रहती थीं।
आखिरी सांस तक निभाया पति को दिया वचन
स्वतंत्रता सेनानी सत्यवती सिन्हा का जब विवाह हुआ था, उस समय वह महज 16 साल की थीं। पति जगदीश नारायण सिन्हा देश की आजादी के लिए पूरी तरह समर्पित थे। उन्होंने शादी के समय सत्यवती से वचन लिया था कि वह खादी ही पहनेंगी।
सत्यवती की बेटी किरण कौशिक बताती हैं कि उनकी मां ने आखिरी सांस तक यह वचन निभाया। वह खादी की साड़ी ही पहनती थीं। किरण कौशिक एक प्ले स्कूल चलाती हैं। उन्होंने बताया कि मां जब भी स्कूल में आती थीं तो हमेशा बच्चों को देशभक्ति से जुड़ी बातें और गीत सुनाती थीं।