नारी निकेतन और जिला शरणालय एवं प्रवेशालय (महिला) में संवासिनियों की जिंदगी दर्द भरी चीख बनकर रह गई है।
बिस्तर पर पाखाना-पेशाब
सर्दियों की रातें ठिठुरते, चीखते-चिल्लाते गुजरती हैं। बीमार संवासिनियां बिस्तर पर पाखाना-पेशाब में पड़ी रहती हैं। ऐसा नहीं कि अधिकारी इन हालात से अंजान हैं। सारी जानकारी होने के बावजूद लापरवाही बरती जा रही है।
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नारी निकेतन के संवासिनियों के गुनाहगारों में समाज कल्याण विभाग के साथ जिला प्रशासन भी है। निकेतन के प्रभारी समाज कल्याण अधिकारी राम अवतार सिंह ने 10 दिसंबर को जाकर वहां के हालात देखे थे।
उसके बाद ही रानी (26) और सूरजी (28) की मौत हुई है। रानी को एसडीएम देहरादून और सूरजी को एसडीएम विकासनगर के आदेश पर यहां लाया गया था। इन अधिकारियों ने दोनों को यहां छुड़वाने के बाद उनकी खैरियत नहीं ली।
सभी संवासिनियां मानसिक रोगी
नारी निकेतन कार्यवाहक अधीक्षिका भद्रा बिष्ट और संविदा की केयर टेकर कविता और रेवती के भरोसे चल रहा है। इस पर यहां हल्द्वानी से 23 और कोटद्वार से 17 संवासिनियां और भेज दी गईं जबकि उन दोनों जगहों पर नारी निकेतन हैं।
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सिंह कहते हैं कि 90 संवासिनियों में 18 सामान्य थीं। हकीकत में लगभग सभी संवासिनियां मानसिक रोगी हैं, जो कुछ ठीक-ठाक आई थीं, माहौल से अवसाद ग्रस्त हो गईं। उनके शरीर और चेहरे नजर डालते ही नारी निकेतन की हकीकत परत-दर-परत उधड़ जाती है।
एनीमिया और कुपोषण ने संवासिनियों के चेहरों को जर्द और स्याह कर दिया है। जिस्म खाल और हड्डी भर है। मिजाज में चिड़चिड़ापन और व्यवहार पागलपन सा। केयर टेकर कहती हैं कि वे बिस्तर पर ही पाखाना-पेशाब कर देती हैं।
सारी रात चीख-पुकार
जाड़े में रजाई उठाकर फेंक देती हैं। सारी रात चीख-पुकार में जाती है। इन मरीजों की देखभाल के लिए निकेतन के पास एक नर्स तक नहीं है। स्थिति बहुत बिगड़ जाती तो अस्पताल लाया जाता है।
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लोगों का कहना है कि समाज कल्याण विभाग और प्रशासन पैसे के कारण अगर संवासिनियों की व्यवस्था नहीं कर पा रहा तो समाज सेवी संगठन कर देंगे।