प्रचंड बहुमत के बाद जो नेता मोदी-शाह के प्रभाव में चुप रहे, कई अप्रिय बातों को भी नजरअंदाज किया, वे अब बदल गए हैं। सरकार के सौ दिन के दौरान यह भी एक अहम बदलाव है। शुरूआती दिनों में खामोश भाजपा विधायक न केवल मुखर हो गए हैं, बल्कि अपने मंत्रियों से ही लोहा लेने में भी उन्हें गुरेज नहीं है।
प्रचंड जनादेश वाली अपनी सरकार के सौ दिन पूरे होने पर बीजेपी चहक रही है। रफ्तार पर सवाल हो सकते हैं, लेकिन कई उपलब्धियां भी खाते में दर्ज हैं। इन स्थितियों के बीच, बीजेपी के लिए जो चौंकाने वाली बात है, वह उसके प्रमुख नेताओं का अपने ही मंत्रियों के खिलाफ आक्रामक रवैया है। इनमें विधायक भी हैं, तो पार्टी के पदाधिकारी भी।
उनकी मंत्रियों से जाने-अनजाने होने वाली टकराहट के कई उदाहरण सामने हैं। अपनों की नाराजगी की वजह बीजेपी का नेतृत्व तलाश नहीं पा रहा है। मगर बेचैन जरूर है। सिलसिला तेजी से आगे न बढे़, इसको लेकर अब उसकी चिंता है। हालांकि औपचारिक बातचीत में पार्टी नेतृत्व मंत्रियों और प्रमुख नेताओं के बीच टकराहट की बातों को खारिज कर रहा है।
टकराहट की बानगी
उमेश शर्मा 'काऊ'
- फोटो : file photo
नगर निकायों का सीमा विस्तार
रायपुर विधायक उमेश शर्मा काऊ नगर निकायों के सीमा विस्तार के एकदम खिलाफ दिख रहे हैं, जबकि शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक के लिए ये अभियान प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। काऊ सीमा विस्तार के खिलाफ पंचायत प्रतिनिधियों के आंदोलन को खुला समर्थन दे रहे हैं। उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों के धरना कार्यक्रम में बकायदा शिरकत भी की है।
चंपावत में डीपीसी की मीटिंग
चंपावत जिले में जिला नियोजन समिति यानी डीपीसी की बैठक के दौरान बीजेपी के विधायक पूरन फर्त्याल और लोहाघाट विधायक कैलाश गहतोड़ी की भूमिका सरकार असामान्य दिखाई दी। प्रभारी मंत्री रेखा आर्या की अध्यक्षता वाली बैठक का कांग्रेसी सदस्यों ने बहिष्कार किया, तो बीजेपी के दो विधायक भी बाहर आ गए। कहा जा सकता है कि वे अपने मंत्री के साथ खडे़ नहीं दिखाई दिए। यहां पर जिले के विकास के लिए बजट में कटौती के मामले ने मंत्री को असहज किया था।
दून की अतिक्रमण विरोधी मुहिम
राजधानी देहरादून में अतिक्रमण विरोधी मुहिम को शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाया है, लेकिन विरोध कर रहे व्यापारियों में बीजेपी के प्रमुख नेता अनिल गोयल और उमेश अग्रवाल दिखाई दे रहे हैं। अपनी ही सरकार के खिलाफ बीजेपी के इन नेताओं का रुख आक्रामक है। इन नेताओं ने सरकार के स्टैंड और व्यापारियों के साथ जैसे विकल्पों में से दूसरे नंबर के विकल्प को चुना है।
बजट सत्र में अपनों की घेराबंदी
हाल ही में निबटे विधानसभा के बजट सत्र में जिस तरह से बीजेपी के विधायकों ने अपनी ही सरकार को घेरा, उसने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया है। सवाल ये है कि अपने मंत्रियों से बीजेपी के विधायक खुश क्यों नहीं हैं। वरिष्ठ बीजेपी विधायकों की नाराजगी में कहीं न कहीं मंत्री पद की लालसा और निराशा का हाथ माना जा सकता है, लेकिन नए विधायक भी नाराज हैं, तो इसे बहुत सामान्य नहीं माना जा सकता।
जनप्रतिनिधियों और प्रमुख नेताओं पर अपने-अपने क्षेत्र और वर्ग का प्रेशर होता है। सभी की दिलचस्पी जनहित में है। ऐसे में किसी बात पर कोई मतभेद होता भी है, तो उसे हम सब मिलकर दूर कर लेते हैं। ऐसा पहले से होता आया है और आगे भी इसी तरह से चीजों को ठीक कर लिया जाएगा।
- श्याम जाजू, प्रदेश प्रभारी
मेरा सिर्फ इतना कहना है कि नगर निगम में जो इलाके पहले से शामिल है, उनकी दशा तो सुधार ली जाए। नगर निगम का डिप्टी मेयर रहा हूं। मैने ही कई गांव नगर निगम में शामिल कराए थे। आज उनकी बुरी स्थिति है। सरकार ऐसी बेहतर स्थिति बनाए कि ग्रामीण इलाके खुद ही नगर निगम में शामिल होने के लिए तत्पर हों। बगैर ऐसे किए गांवों को नगर निगम में मिलाना गलत है।
- उमेश शर्मा काऊ, बीजेपी विधायक रायपुर
विधानसभा के बजट सत्र में मैने कई सवाल उठाए, लेकिन मंत्रियों को घेरने की मंशा नहीं रही। मंत्रियों के जवाब अफसर तैयार करते हैं, उन जवाबों में कई बार महत्वपूर्ण मुद्दों को टालने की कोशिश दिखती है। एक जनप्रतिनिधि होने के कारण मैनें और बीजेपी के कई विधायकों ने प्रखरता से सवाल किए। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
- महेंद्र भट्ट, बीजेपी विधायक बदरीनाथ
ये कहना गलत है कि हमने मंत्री की मुखालफत की। कई खबरें ऐसी छपी भी हैं। कांग्रेस के विधायक बैठक से बाहर आ गए थे और कोरम पूरा नहीं था, तो हम दोनों बीजेपी के विधायक क्या करते। हमें भी बाहर आना ही पड़ा।
- पूरन फर्त्याल, बीजेपी विधायक चंपावत