अपने बच्चों का पढ़ लिखकर अगली क्लास में दाखिला पाना प्रदेश की तीस हजार से अधिक भोजन माताओं के लिए अभिशाप बन गया है। शासन के अजीबो गरीब फरमान के चलते स्कूल में वर्षों की सेवा के बावजूद भोजन माताओं को उनके पद से हटाया जा रहा है।
शासनादेश में कहा गया है कि स्कूल में वे ही भोजन माताएं रहेंगी जिनके पाल्य उस स्कूल में पढ़ते हों। इस जीओ के चलते हजारों भोजन माताओं के सामने रोजी रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है।
केस नंबर एक
पौड़ी जिले के द्वारीखाल ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय वडलबडा में पिछले आठ साल से बच्चों के लिए भोजन बना रही 45 वर्षीय कपोत्री देवी का बेटा मयंक जब तक उसी के विद्यालय में पढ़ता रहा, कपोत्री भोजन माता के पद पर रही, लेकिन मयंक के स्कूल से निकलकर इंटर कालेज में दाखिला पाने पर उसे भोजन माता के पद से हटा दिया गया। स्कूल से निकाले जाने के बाद अपनी समस्या को लेकर शिक्षा निदेशालय पहुंची कपोत्री की आपबीती सुनाते हुए आंखें भर आई।
केस नंबर दो
ऊखीमठ ब्लॉक जनपद रुद्रप्रयाग के राजकीय इंटर कालेज राउलेक में पिछले छह साल से भोजन माता के पद पर कार्यरत सुनीता को पिछले छह महीने से मानदेय नहीं मिल पाया है। सुनीता की पुत्री शशि व पुत्र अनिल के आठवीं पास कर इंटर कालेज में दाखिला पाने पर उसे हटाया गया। सुनीता ने बताया कि वे स्कूल जा रही है, लेकिन मानदेय नहीं दिया जा रहा है।
केस नंबर तीन
प्राथमिक विद्यालय एकेश्वर में भोजन माता के पद पर कार्यरत अनीता देवी की पुत्री प्रियंका जब तक उसके स्कूल में पढ़ती थी, सब कुछ ठीक रहा, लेकिन अनीता के पांचवीं पास कर अगली कक्षा में जाने पर उसे भोजन माता के पद से हटा दिया गया।
यह है शासन का अजीबो गरीब फरमान
विद्यालय की छात्र संख्या कम होने की स्थिति में मानक से अधिक भोजन माताओं को हटा दिया जाएगा। मानकानुसार वही भोजन माताएं विद्यालयों में कार्यरत रहेंगी जिसका पाल्य उस विद्यालय में अध्ययनरत हो। यदि पूर्व से कार्यरत सभी भोजन माताओं के पाल्य विद्यालय में अध्ययनरत हो तो ऐसी स्थिति में जिन भोजन माताओ का पाल्य सबसे निचली कक्षा में अध्ययनरत होगा वही भोजन माता कार्य करती रहेगी।