आजादी से पहले पिथौरागढ़ में शुरू हुई कनालीछीना की रामलीला इस बार 82वें वर्ष में पहुंच गई है। वर्ष 1934 में यहां आगाज हुआ था। कनालीछीना की रामलीला में 48 साल पहले ऐसा भी हुआ कि राम ने रावण को मारने के लिए तीर चलाया और रावण के पात्र की वास्तव में मौत हो गई।
वर्ष 1934 में पंडित के नाम से विख्यात गोपाल सिंह सिरौला के प्रयासों से कनालीछीना में रामलीला शुरू हुई। पंडित सिरोला ही रामलीला कमेटी के पहले अध्यक्ष थे। चीड़ के छिलके, मशाल के उजाले में 10 साल तक रामलीला का मंचन हुआ। 1944 में मिट्टी के तेल से जलने वाले पैट्रोमैक्स से रोशनी हुई। 70 के दशक से बिजली से रोशनी की व्यवस्था हो रही है।
वर्ष 1967 की रामलीला में एक ऐसी घटना हुई, जिसे लोग अक्सर याद करते हैं। कनालीछीना रामलीला कमेटी के वक्ता मैनेजर रमेश चंद्र पांडे ने बताया कि तब राम-रावण युद्ध का मंचन हो रहा था।
स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ चंद्र सिंह
राम ने जैसे ही रावण की ओर तीर चलाया रावण के पात्र चंद्र सिंह दिगारी जमीन में गिर पड़े। जब वह काफी देर तक नहीं उठे, लोगों ने पास जाकर देखा तो चंद्र सिंह (50) की मृत्यु हो चुकी थी।
तब राम की भूमिका में देब सिंह दिगारी थे। लोग चर्चा करते थे कि चंद्र सिंह तो बड़ा सौभाग्यशाली है, भगवान राम के बाण से स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ है। वहीं, गांव के 96 वर्षीय बुजुर्ग मथुरा दत्त जोशी ने बताया कि चंद्र सिंह की मृत्यु की वजह हार्टअटैक रही थी।
पहली रामलीला की बचत से बना था जूनियर हाईस्कूल
वर्ष 1934 की पहली रामलीला में राम की भूमिका निभाने वाले जोशयूड़ा (कनालीछीना) निवासी राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता रिटायर्ड शिक्षक मथुरा दत्त जोशी (96) बताते हैं कि स्यूंता (चीड़ के बीज) जलाकर सिमलपट्टा मैदान में पहली रामलीला का आयोजन हुआ। कहते हैं कि कनालीछीना में रामलीला की शुरुआत का श्रेय पंडित गोपाल सिंह सिरोला को जाता है।
बताते हैं कि पहली रामलीला में 1800 रुपए की बचत हुई थी। उक्त रकम की मदद से क्षेत्र के लोगों ने श्रमदान कर जूनियर हाईस्कूल कनालीछीना के लिए भवन बनाया था, स्कूल की स्थापना की थी। पहली रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका में चंद्र सिंह दिगारी थे। वक्ता मैनेजर पाली गांव के खड़क सिंह दिगारी थे।