गणतंत्र दिवस के दिन इस बार राजपथ पर उत्तराखंड की रम्माण झांकी का नजारा देखने को मिलेगा।
केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने चमोली जिले के गांव सलूड़-डुंग्रा में प्रति वर्ष अप्रैल माह में आयोजित होने वाले रम्माण उत्सव को झांकी के तौर पर मंजूरी दी है। झांकी के नोडल अधिकारी और सहायक सूचना निदेशक कलम सिंह चौहान ने बताया कि सीएम हरीश रावत ने रम्माण को झांकी के रूप में शामिल करने के निर्देश दिए थे।
केंद्र को जागेश्वर धाम, झुमैलो और रम्माण विषय पर प्रस्ताव भेजे थे, जिसमें से रम्माण की झांकी का चयन हुआ। चमोली जनपद के सलूड़-डुंग्रा गांव में प्रति वर्ष अप्रैल माह में रम्माण उत्सव होता है। इस उत्सव को 2009 में यूनेस्को ने भी विश्व धरोहर घोषित किया था।
रम्माण का आधार रामायण की मूलकथा है और राज्य की प्रचीन मुखौटा परंपराओं के साथ जुड़कर रामायण ने स्थानीय रूप ग्रहण किया। रामायण से रम्माण बनी। धीरे-धीरे यह नाम पूरे पखवाड़े तक चलने वाले कार्यक्रम के लिए प्रयोग होने लगा। रम्माण में रामायण के कुछ चुनिंदा प्रसंगों को लोकशैली में प्रस्तुत किया जाता है।
रात्रि को भूम्याल देवता के मंदिर प्रांगण में मुखौटे पहनकर नृत्य होता है। ये मुखौटे विभिन्न पौराणिक, ऐतिहासिक तथा काल्पनिक चरित्रों के होते हैं। स्थानीय तौर पर इन मुखौटों को दो रूपों में जाना जाता है। ‘द्यो पत्तर’ और ‘ख्यलारी पत्तर’। ‘द्यो पत्तर’ देवता से संबंधित चरित्र और मुखौटे होते हैं और ‘ख्यलारी पत्तर’ मनोरंजक चरित्र और मुखौटे होते हैं। इसमें सामूहिक पूजा, देवयात्रा, लोकनाट्य, नृत्य, गायन, प्रहसन, स्वांग, मेला आदि विविध रंगी आयोजन होते हैं।
अभी तक आठ झांकियों का हुआ चयन
राज्य गठन के बाद से अब तक राजपथ पर कुल आठ झांकियों का प्रदर्शन किया गया है। 2003 में फुलदेई, 2005 में नंदा राजजात, 2006 में फू लों की घाटी, 2007 में कार्बेट नेशनल पार्क, 2009 में साहसिक पर्यटन, 2010 में कुंभ मेला हरिद्वार, 2014 में जड़ी बूटी और 2015 में केदारनाथ विषय पर झांकी राज्य की तरफ से चयनित हुई।