यह नई सहस्त्राब्दी का भगवा धर्म है। अब त्याग, सेवा और तपस्या नहीं, अपितु तिजोरी का दम देखा जाता है। खजाना भारी है तो संत, महंत, महामंडलेश्वर और यहां तक कि आचार्य पद भी मिल जाते हैं। अब तो रामानंदाचार्य और शंकराचार्य जैसे जगद्गुरु पदों का भी सौदा होने लगा है।
मुंबई की राधे मां इसी हरिद्वार में रातों-रात जूना अखाड़े की महामंडलेश्वर बनीं और विरोध के बाद हटा भी दी गईं। दक्षिण भारत के विवादित संत स्वामी नित्यानंद विगत प्रयाग कुंभ में महानिर्वाणी अखाड़े के महामंडलेश्वर पद पर आसीन हो गए। शनि संत के रूप में विख्यात दाती महाराज हरिद्वार कुंभ में महामंडलेश्वर बन गए। इनमें से किसी ने भी वर्षों अखाड़ों में रहकर सेवा या साधना नहीं की।
नारायण सेवा संस्थान उदयपुर के संचालक डॉ. कैलाश मानव अखाड़े में कोई सेवा किए बगैर बैरागियों की निर्मोही अणि के न केवल महामंडलेश्वर अपितु पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर बन गए। उन्हें हरिद्वार कुंभ में स्वयं श्रीमहंत ज्ञानदास की कृपा से यह पदवी मिली।