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बारिश न होने से सिसक रहा उत्तराखंड का ‘कश्मीर’

Mon, 23 Nov 2015 05:07 PM IST
अमरनाथ/ अमर उजाला, लोहाघाट (चंपावत)
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हिमालय की गोद में रहकर भी 'कश्मीर' कहा जाने वाला लोहाघाट प्यासा है। 16 दिन पहले यहां महज पांच मिमी बारिश हुई।
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अक्तूबर में बारिश की एक बूंद नहीं पड़ी। खेतीखान से लेकर तमाम इलाकों में खेत सूखे पड़े हैं। जंगलों और बागों में भी पेड़ सूखने लगे हैं। माल्टा समेत अन्य फलों के आकार छोटे हो गए हैं और उनमें रोग लगने लगे हैं।

लोहाघाट और चंपावत का तापमान 22 नवंबर को 18 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि पिछले वर्ष इन दोनों जगहों का तापमान 22 नवंबर को ही 16.7 डिग्री सेल्सियस था। मौसम चक्र गड़बड़ाने के चलते यह तस्वीर उभरकर सामने आई है। पर्यावरणविद इसे जंगलों के कटान के चलते पैदा हुए ग्लोबल वार्मिंग का असर मान रहे हैं।
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1834 में यहां आए ब्रिटिश हंटर पी बैरन ने अपने संस्मरण में लिखा कि जब लोहाघाट ही कश्मीर सा है तो हम कश्मीर क्यों जाएं। जाहिर है कि तब यहां का पर्यावरण बेहद सुकूनदेह रहा होगा पर अब अपनों के हाथ सरकार होने के बावजूद परिस्थितियां बदली हैं।

लोहाघाट और उसके आसपास देवदार, बांज समेत अन्य बेशकीमती पेड़ कटने से फिजां पहले के मुकाबले बदली है। कागजों में वन विभाग भले ही लाखों पेड़ लगाने का दावा करे, लेकिन धरातल पर नए पेड़ नहीं दिखते।

मौसम चक्र में बदलाव का ही नतीजा है कि इस बार मानसून में बारिश में भी गिरावट आई है। इस साल मानसूनी अवधि में मात्र 614 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि पिछले साल बारिश का ये आंकड़ा 882 एमएम था।

समाजसेवी प्रकाश जोशी शूल का कहना है कि वनों की खड़ी के साथ-साथ पड़ी लकड़ी पर भी सरकार का अधिकार है।  इसलिआम लोगों में वनों के प्रति दिलचस्पी घटी है।

ग्लोबल वार्मिंग के चलते कुमाऊं के मौसम चक्र में भी बदलाव आया है। इस इलाके में बारिश न होने का बड़ा कारण डिफॉरेस्ट्री है। अवैध लकड़ी का व्यापार भी बढ़ा है। यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट 1000 मीटर से ऊपर की ऊंचाई पर लगे बांज जैसे पेड़ों का कटान पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया हुआ है।
- डॉ. अजय रावत, पर्यावरणविद्

मायावती आश्रम में स्थिर तापमान है आइना
ग्लोबल वार्मिंग दुनियाभर के लिए तगड़ी चुनौती है। मगर लोहाघाट का मायावती अद्वैत आश्रम इसका अपवाद है। यहां बीते 115 वर्षों से तापमान में खास अंतर नहीं आया है। यहां 22 नवंबर को तापमान 14 डिग्री सेल्सियस था।

आश्रम का कहना है कि यहां लगातार वनीकरण करने और कम आबादी के चलते तापमान में विशेष बदलाव नहीं हुआ है। यह आश्रम परिस्थितिक तंत्र को संतुलित रखकर अरसे से सरकार को आइना दिखा रहा है।

वनीकरण की नहीं हो रही देखरेख
वन विभाग ने इस साल करीब 60 हजार से अधिक पौधे रोपे। मगर ये वनीकरण जमीन में नजर नहीं आता। लोगों का कहना है कि कागजों में वनीकरण खूब हो रहा है, लेकिन उसको लगाने के बाद रखरखाव नहीं होने से इनमें से 10 प्रतिशत भी संरक्षित नहीं हो पा रहे हैं। वहीं पेड़ों के कटने की तेज गति भी मौसम चक्र पर मार कर रही है।
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सिटरस फलों पर भी पड़ रहा असर
जिला उद्यान अधिकारी एचसी तिवारी का कहना है कि इस बार हुई कम बारिश का असर सिटरस फलों पर भी पड़ा है। नींबू, माल्टा और संतरा प्रजाति के फलों की पैदावार में गिरावट हुई है। साथ ही दाना भी छोटा है। जिले में पिछले साल 2226 हेक्टेयर क्षेत्र में 4451 हेक्टेयर सिटरस उत्पादन हुआ था, लेकिन इस बार उत्पादन में भारी कमी की आशंका है।
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