समूचा उत्तराखंड जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों की चपेट में है। टिहरी और चंपावत सबसे अधिक प्रभावित हैं।
उत्तराखंड क्लाइमेट चेंज सेंटर को ब्लाकों से यह पहला फीड बैक मिला है। स्थिति के प्रति सचेत करते हुए कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए परियोजनाएं पेरिस समझौते के दायरे में तैयार की जाएं। ऐसा नहीं होने पर नई बीमारियां बढ़ेंगी और अनियमित बारिश व सूखे की मार सख्त होगी। सबसे अधिक दबाव हाउसिंग सेक्शन पर आने वाला है।
उत्तराखंड क्लाइमेट चेंज सेंटर ने प्रदेश के 95 ब्लाकों से फीड बैक लिया है। फीड में पाया गया कि बारिश अधिक होने से बाढ़, भूस्खलन का खतरा बढ़ेगा। इससे हाउसिंग प्रोजेक्ट स्थल चिह्नित करने में सतर्कता बरती जाए। जहां आबादी है वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हों। ग्लेशियर टूट रहे हैं।
डेंगू, स्वाइन फ्लू, मलेरिया और दूसरी बैक्टीरियल बीमारियां उन पर्वतीय क्षेत्रों में पहुंच रही हैं, जिनका नाम वहां सुना नहीं गया था। वनस्पतियों का फ्लावरिंग समय बदल गया है। झरने सूखने से जल संकट मंडरा रहा है। बारिश तेज, लेकिन अनियमित हो गई है। कमोबेश यही हाल बर्फबारी का है।
सेंटर ने सुझाया है कि मौसम में आ रहे इस बदलाव से परंपरागत नीतियों से योजनाएं बनाने से समस्या हल नहीं होगी। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और उत्तराखंड वन विभाग के बैनर तले संयुक्त रूप से संचालित किए जा रहे क्लाइमेट चेंज सेंटर ने अलग-अलग टीमों को इन ब्लाकों में भेजा था। यह फीड बैक क्लाइमेट डेवलपमेंट नॉलेज नेटवर्क (सीडी कैम), आईआईटी दिल्ली, इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बंगलुरु के उत्तराखंड में किए गए संयुक्त सर्वेक्षण के मद्देनजर लिया गया।
ब्लाकों से जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का अलग-अलग फीड बैक मिल रहा है। इससे हाउसिंग सेक्शन पर सबसे अधिक दबाव बढ़ेगा।
- आरएन झा, मुख्य वन संरक्षक एवं नोडल अधिकारी, उत्तराखंड क्लाइमेट चेंज सेंटर