नमामि गंगे अभियान के तहत गंगा किनारे जैविक खेती करके नदी को प्रदूषण मुक्त करने के साथ ही इसके जलीय जीव-जंतुओं के संसार को सुरक्षा कवच दिया जा रहा है।
उत्तराखंड सरकार ने इस संबंध में प्रयास तेज कर दिए हैं। गंगा किनारे बसे गांवों के किसानों को प्रशिक्षण देकर उन्हें जैविक खेती के लिए प्रेरित करने का सिलसिला तेज हो गया है। इससे कीटनाशक और रासायनिक खाद का कृषि में इस्तेमाल नहीं होगा, जिससे गंगा के जीव-जंतुओं का संसार भी सुरक्षित रहेगा।
गंगा किनारे जैविक खेती के संबंध में हाल में ही केंद्रीय जल संसाधन और कृषि मंत्रालय के बीच समझौता हुआ है। उत्तराखंड शासन ने जैविक खेती की कार्ययोजना को सख्ती से लागू करने का निर्णय लिया है। प्रदेश में गंगा के पानी का खेतों की सिंर्चाई के लिए सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाता है।
गंगा किनारे जो गांव स्थित हैं, वहां परंपरागत ढंग से खेती की जाती है। खेतों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का भी इस्तेमाल भी किया जाता है। बारिश में पानी के साथ रासायनिक खाद और कीटनाशकों की कुछ मात्रा गंगा में बह आती है। यह नदी में प्रदूषण का स्तर बढ़ा देती है। इससे गंगा के जल जीव-जंतुओं को भी नुकसान पहुंचता है। प्रदेश के पर्वतीय जिलों में जैविक खेती की कार्ययोजना को पहले ही लागू किया जा चुका है। इस संबंध में शासन सबसे अधिक ध्यान हरिद्वार जिले पर दे रहा है।
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। जैविक उत्पाद परिषद का भी गठन किया गया है। गंगा नदी में रासायनिक खाद, कीटनाशकों के जाने की बात है तो यह समस्या हरिद्वार जिले में हो सकती है। हरिद्वार जिले में जैविक खेती को बढ़ावा देने की खास योजना बनाई जाएगी।
- डा. रणवीर सिंह, अपर मुख्य सचिव