उत्तराखंड में क्लीनिकल इस्टेबलिशमेंट एक्ट लागू करने में हो रही देरी पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने चिंता जताई है।
सरकार हुई नाकाम
तीन बरस पहले प्रभावी हुए एक्ट से प्राइवेट अस्पतालों के मंहगे इलाज और मनमानी पर शिकंजा कस जाएगा लेकिन सरकार इसे प्रभावी बनाने में नाकाम रही है।
जिसका मुख्य कारण इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के साथ निजी अस्पतालों का विरोध है। एक्ट प्रभावी नहीं होने से केंद्र से मिलने वाले अनुदान से भी राज्य वंचित है। अब केंद्र के दबाव से हरकत में आए स्वास्थ्य महकमा प्रभावी बनाने की रिपोर्ट तैयार कर रहा है।
केंद्र ने क्लीनिकल इस्टेबलिशमेंट एक्ट 2010 की अधिसूचना 2012 में जारी की है। आईएमए राष्ट्रीय स्तर पर एक्ट के तहत कड़े प्रावधानों में रियायत और बदलाव की मांग करता रहा है।
एक्ट के तहत निजी अस्पतालों के पंजीकरण संबंधित नियमावली 2013 में तैयार कर दी गई, जिसे कैबिनेट से स्वीकृति मिल गई। नियमावली में एक वर्ष तक अस्थाई पंजीकरण का प्रावधान रखा गया है।
कैबिनेट से अप्रूवल के बाद अब केंद्रीय एक्ट को विधानसभा से पारित कर नियमावली अधिसूचित की जानी है। जिसके तहत प्रथम चरण में एक डाक्टर के क्लीनिक से लेकर बड़े नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों का पंजीकरण अनिवार्य हो जाएगा।
अगले हफ्ते बुलाई है अधिकारियों की बैठक
एक्ट को प्रभावी बनाने में हो रही देरी पर अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दखल किया है। केंद्र ने राज्य के स्वास्थ्य महकमे को एक्ट जल्द लागू करने को कहा है।
इसके लिए अगले सप्ताह विभागीय प्रमुख सचिव ने अधिकारियों की बैठक बुलाई है, जिसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में रिपोर्ट भेजी जाएगी।
एक्ट में प्रावधान
- निजी अस्पतालों के लिए भी इमरजेंसी में मरीज को उपचार देना अनिवार्य
- इलाज के नाम पर वसूली रोकने के लिए स्टेंडर्ड प्रोसिजर आफ ट्रीटमेंट होगा
- अस्पतालों में मौजूद चिकित्सा सेवाओं को सूचना पट्ट पर प्रकाशित करना होगा
- छोटे क्लीनिकों से लेकर बड़े अस्पतालों के संचालन मानक तय करेगी सरकार
- जिलों पर डीएम, एएसपी और सीएमओ के अधीन बनेगी एक कमेटी
- चिकित्सा सेवाएं न देने पर निजी अस्पतालों पर पांच लाख तक जुर्माने का प्रावधान
- स्वास्थ्य विभाग में प्रत्येक निजी और सरकारी अस्पताल का होना जरूरी