उत्तराखंड आवास एवं विकास परिषद की प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों के लिए बनने वाले आवास फाइलों के खेल में उलझ कर रह गए हैं। इस योजना को बड़े-बड़े दावों के साथ शुरू किया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि यह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई। योजना के तहत सभी प्रस्ताव कृषि भूमि के मिले हैं। लेकिन, लैंड यूज में बदलाव पर मामला अटक गया है।
यह मामला गरीबों की सुख सुविधा से जुड़ा है। शायद यही वजह है कि यह योजना आगे नहीं बढ़ पा रही है। प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना सबके लिए आवास (शहरी) के तहत पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड में आवास बनाए जाने थे। आवास विकास ने करीब एक साल पहले आवासीय योजना के लिए भू-स्वामियों के साथ ही बिल्डरों से जगह उपलब्ध कराने को कहा था, जिसमें मैदान क्षेत्र में कम से कम चार तथा पर्वतीय क्षेत्रों में दो हजार वर्गमीटर भूमि होना जरूरी था।
मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) और नगर निगम की तर्ज पर आवास विकास विभाग ने भी पिछले वर्ष गरीबों के लिए पूरे प्रदेश में आशियाना बनाने का निर्णय लिया था। इसे लेकर 15 आवेदन विभाग को मिले थे, जिसमें करीब छह आवेदन राजधानी से आए थे। लेकिन, सभी प्रस्ताव कृषि भूमि के थे। ऐसे में लैंडयूज में बदलाव कराने का सिरदर्द किसी ने मोल नहीं लिया और योजना जहां से शुरू हुई थी वहीं थम गई। ऐसे में गरीबों के अपने घर का सपना जल्द पूरा होता नहीं दिख रहा है।
पेंच फंसने की प्रमुख वजह
लैंडयूज बदलने की प्रक्रिया काफी जटिल है, इसे केवल शासन स्तर पर ही मंजूरी मिलने के बाद ही बदला जा सकता है। आवास विकास को जितने भी आवेदन मिले हैं, वह सभी कृषि भूमि के हैं, यही वजह है कि उन पर निर्माण की अनुमति अभी तक नहीं मिल सकी है।
हम आवासीय योजना पर काम कर रहे हैं। लैंडयूज को लेकर पेंच फंसा हुआ है, शासन स्तर पर बात की जा रही है, उम्मीद है कि जल्द ही इसका समाधान निकलेगा।
- अजय माथुर, अधिशासी अभियंता, उत्तराखंड आवास एवं विकास परिषद