सूखा, बाढ़, सूखते जलस्रोत, मानव-वन्य जीव संघर्ष और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने के कारगर नुस्खे पुराणों में हैं। अगर इन्हें वैज्ञानिक सोच के साथ लागू किया जाए तो समस्या का निदान मिल जाएगा। यह कहना है देश में भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के टॉपर डॉ. अंकुर अवधिया का। उनका कहना है कि लैब में सिद्धांत बनाने के बजाए फील्ड में आकर शोध करने से मसलों का हल निकलेगा।
आईएफएस डॉ. अंकुर अवधिया हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के टॉपर होने के साथ आईआईटी कानपुर में बायोलॉजिकल साइंसेस में अपने बैच के टॉपर रहे हैं। आईआईटी से ही उन्होंने बायोडिग्रेडिबल प्लास्टिक में पीएचडी भी की थी।
इसके बाद भारतीय वन सेवा में आए। अंकुर बताते हैं कि उन्हें तीन कंपनियों ने जॉब ऑफर किया था। इसके साथ ही आईआईटी में शिक्षण कार्य का भी उनके सामने अवसर था, लेकिन वन एवं पर्यावरण के क्षेत्र में आकर फील्ड में काम करने के लिए उन्होंने भारतीय वन सेवा को चुना। उनके माता-पिता डॉक्टर हैं।
पुराणों में हैं अनेकों नुस्खे
देश में सूखा एक बड़ी समस्या बनकर सामने आया है।
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मूलत: यूपी का अवधिया परिवार बाद में मध्य प्रदेश चला गया। डॉ. अवधिया ने बताया कि विष्णु पुराण तथा अन्य पुराणों में सूखा, बाढ़, जलवायु परिवर्तन से बचाव के वैज्ञानिक और सटीक नुस्खे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में जलस्रोतों को सूखने से बचाने के लिए छोटे चेक डैम बनाना, नदियों की धारा को अविरल बनाए रखने के लिए वनीकरण सब कुछ पुराणों में दिया गया।
हाथियों से सुरक्षा के लिए गांवों की सरहद पर मधुमक्खी पालन, बाघ से बचाव के लिए छोटे दीये जलाना आदि पुराणों के ही नुस्खे हैं। विकास और वन संरक्षण में समन्वय बैठाने की जरूरत है।
तालमेल बैठाकर हो विकास
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी के वर्ष 2014-16 सत्र के उत्तराखंड कैडर के आईएफएस अमित कंवर का कहना है कि वन क्षेत्रों में विकास कार्य पर्यावरण संरक्षण के साथ तालमेल बैठाकर किए जाएं। इसके साथ ही प्राकृतिक आपदाओं और विस्थापन में लोगों को क्षतिपूर्ति समय से दी जाए। अगर कहीं पेड़ों का पातन आवश्यक हैं तो खाली भूमि पर वनीकरण ज्यादा से ज्यादा किया। तभी विकास और पर्यावरण संरक्षण में तालमेल बैठ पाएगा।