भविष्य में बनाये जाने वाले जो भवन भूकंप रोधी नहीं होंगे, वे बिजली और पानी के कनेक्शन से महरूम हो सकते हैं। इसका एक प्रस्ताव कैबिनेट की बैठक में लाया जाएगा। भूकंपीय संवेदनशीलता के मद्देनजर गठित उच्च स्तरीय कमेटी ने ये सिफारिश की है।
समिति ने प्रदेश के विनियमित क्षेत्रों में बिल्डिंग बॉयलाज को बेहद सख्ती के साथ लागू करने पर जोर दिया है। इसके लिए समिति ने कई और निर्णय लिए हैं, जिन्हें चरणबद्ध ढंग से लागू करने की सिफारिश की गई है।
बता दें कि भूगर्भीय हलचलों के लिहाज से उत्तराखंड बेहद संवेदनशील है। पूरा प्रदेश जोन चार व पांच के अंतर्गत है। राज्य के लोग उत्तरकाशी और चमोली के भूकंप की त्रासदी के गवाह रह चुके हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग भूकंप के खतरों से निपटने के उपाय तलाश रहा है।
सरकारी सिस्टम को चौकस करने के साथ उसके सामने भवनों की मजबूती सबसे बड़ी चुनौती है। यहां भवन निर्माण में भूकंप रोधी तकनीक इस्तेमाल नहीं हो रही है। बेशक नये बॉयलाज बन गए हैं। राज्य में विनियमित क्षेत्रों में इन्हें लागू करने वाली एमडीडीए व एचडीए सरीखी संस्थाएं भी हैं। इसके बावजूद भवनों के निर्माण में भूकंप की संवेदनशीलता पूरी तरह से नजरांदाज हो रही
है।
राज्यस्तर पर गठित बिल्डिंग बॉयलाज कमेटी भवन निर्माण से जुड़ी नियामक एजेंसियों पर दबाव बना रही है। इसके लिये बिल्डिंग बॉयलाज समिति की बैठक में अहम निर्णय लिये गए। चर्चा के दौरान समिति ने पाया कि नियामक एजेंसियों में कर्मचारियों की भारी
कमी हैं। जो कर्मचारी वहां तैनात हैं, वह पूरी तरह से दक्ष नहीं हैं। तीसरा और सबसे अहम कि मानकों को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।