सहसपुर के चुनावी समर में कांग्रेस के सेनापति किशोर उपाध्याय को अपने ही सिपहसलार से कड़ी चुनौती मिल रही है। मैदान में उतरे निर्दलियों ने कांग्रेस और भाजपा का गणित उलझा दिया है। चुनावी बाजी वोटों के जातीय समीकरणों पर केंद्रित हो गई है, जिसमें मुस्लिम समुदाय का वोट बैंक निर्णायक भूमिका में माना जा रहा है। इस वोट बैंक पर सेंध लगाने के लिए किशोर और आर्येन्द्र तगड़ी जद्दोजहद कर रहे हैं।
कमोबेश यही स्थिति भाजपा प्रत्याशी सहदेव पुंडीर के लिए निर्दलीय लक्ष्मी राणा के साथ है। सेनापति और सिपहसालार की इस जंग में बगावत झेल रही भाजपा भी अपनी राह तलाश रही है। कहते हैं कि सियासत में न कोई स्थायी दोस्त है और न दुश्मन। सहसपुर के चुनावी समर में उतरे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय और आर्येन्द्र शर्मा जिगरी यार रहे हैं। मगर सियासत ने दोनों दोस्तों को एक-दूसरे के आमने-सामने ला खड़ा किया है।
पिछले पांच साल से सहसपुर में तैयारी कर रहे आर्येन्द्र कांग्रेस के टिकट को लेकर आश्वस्त थे, मगर ऐन वक्त उनका टिकट काट कर उनके सेनापति किशोर उपाध्याय को समर में उतार दिया गया। बागी हो गए आर्येन्द्र अब आर-पार की जंग में हैं। मगर जिन समीकरणों के जरिए वह अपनी चुनावी राह आसान करना चाहते हैं, वही समीकरण किशोर भी साध रहे हैं। दोनों महारथियों के बीच छिड़ी इस भीषण जंग में भाजपा अपना गणित बना रही है। जिस सेनापति को पूरे प्रदेश में अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए चक्रव्यूह रचना था, वो खुद व्यूह में फंसा है। कांग्रेस ने कागज पर वोटों के समीकरण का जो खाका खींचा है उसमें किशोर की राह आसान दिख रही है।
मगर जमीन पर तस्वीर उतनी ही पेचीदा है। कांग्रेस का गणित कैडर वोट, मुस्लिम और पर्वतीय मूल के वोटों पर टिका है। पार्टी पिछले चुनाव में अच्छे-खासे वोट ले गए गुलजार अहमद के साथ खड़े होने से भी मुस्लिम वोटों को लेकर आश्वस्त है। मुस्लिम बहुल खुशहालपुर, रामपुर, शंकरपुर व सहसपुर के ग्रामीण इलाके से काफी उम्मीदें हैं। लक्ष्मीपुर, हर्रावाला, तिमली वाले इलाके में भी पार्टी खुद को मजबूत मान कर चल रही है।
मगर आर्येन्द्र शर्मा का गेम प्लान भी इन्हीं वोटों पर फोकस है। चूंकि आर्येन्द्र क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय हैं, इसलिए जनता के बीच चेहरे के तौर पर वह किशोर से ज्यादा सहज हैं। बाहरी के जो तीर कांग्रेस ने कोटद्वार में हरक सिंह रावत पर छोड़े हैं, उन्हीं तीरों से सहसपुर में कांग्रेस जख्मी है। इलाके के कई जनप्रतिनिधियों को जुटाकर आर्येन्द्र मुकाबले में कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। उधर, सत्तारोधी रुझान के बावजूद इस सीट पर विधायक रहे भाजपा प्रत्याशी सहदेव सिंह पुंडीर कैडर वोट पर फोकस कर रहे हैं। सेनापति और सिपहसालार जंग में वह चुनावी राह को आसान बनाने की कोशिश में जुटे हैं।
कंडी, चांदपुर, कोटला, हर्रावाला व बेसनी में सहदेव की तगड़ी पकड़ मानी जा रही है। लेकिन भाजपा की बागी लक्ष्मी अग्रवाल की सक्रियता ने उनके समीकरणों को भी उलझा रखा है। मैदान में यूं तो 14 प्रत्याशी हैं, मगर आर्येंद्र और लक्ष्मी की मौजूदगी ही भाजपा और कांग्रेस के समीकरणों पर असर डाल रही है। पिछले चुनाव में 5618 वोट जुटाने वाली लक्ष्मी की बढ़त भाजपा के लिए मुश्किल पैदा करेगी। कुल मिलाकर सहसपुर के समर में कांग्रेस और निर्दलियों की मौजूदगी ने भाजपा और कांग्रेस के लिए मुकाबला बेहद कड़ा बना दिया है।