उत्तराखंड की चौबट्टा सीट से चार राहें खुलती हैं। इसकी दो राहें सत्ता तक पहुंचने को बेताब हैं। वह राह चुनावी समर में उतरे सतपाल महाराज होंगे या फिर राजपाल सिंह बिष्ट। फैसला इन दोनों महारथियों के बीच ही होना है। चौबट्टाखाल के चुनावी समर में उतरे 15 प्रत्याशियों में असल जंग भाजपा के महाराज और कांग्रेस के राज के बीच सिमट चुकी है।
महाराज का कद बड़ा है। आभामंडल भव्य है। आध्यात्म राजनीति के इस मिश्रित व्यक्तित्व के सामने राजपाल एक जुझारूए जिद्दी और जीवट चरित्र हैं। उनके इसी कौशल के चलते महाराज जरा सी भी ढील देने को तैयार नहीं। उनकी धर्मपत्नी पूर्व कैबिनेट मंत्री अमृता रावत और दोनों सुपुत्र गांव.गांव वोट मांग रहे हैं।
भगवा ब्रिगेड के साथ महाराज के अनुयायियों की फौज अलग जुटी है। समर्थक यहीं धैर्य नहीं धर रहे। लोगों को एहसास करा रहे हैं। वे महाराज के विधानसभा चुनाव लड़ने का ष्राजष् भी समझा रहे हैं। वो बता रहे हैंए चौबट्टा की राह महाराज के ष्राजष् की ओर खुलती है। वरना महाराज लोकसभा से नीचे कब चुनाव लड़े। मगर महाराज की राह में राज खड़े हैं। महाराज के भव्य आभामंडल के बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में उनके समर्थकों के अपने तर्क हैं।
वह जनता के बीच सवाल उछाल रहे हैं। क्या वे ऐसा प्रत्याशी चाहते हैं जो जीतने के बाद सत्तालोक में रम जाएगा या ऐसा प्रत्याशी जो हारने के बाद भी पांच साल न सिर्फ उनके साथ खड़ा रहा बल्कि अपने सामार्थ्य से विकास की इबारत लिखता रहा। राठ क्षेत्र को ओबीसी करानेए पोखड़ा में निजी विवि समेत कई अन्य उपलब्धियों का श्रेय राजपाल को दे रहे हैं। इन दावों.उपलब्धियों के मध्य जब जंग चुनावी समीकरणों की कसौटी पर परखी जाती है तो मुकाबला बेहद रोचक नजर आता है। चौबट्टाखाल का भूगोल जितना बड़ा हैए गणित उतना ही पेचीदा है।
क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ी विधानसभाओं में शुमार इस चुनाव क्षेत्र की सीमाएं पौड़ीएयमकेश्वरए लैंसडौन और श्रीनगर विस को छूती हैं। इसका एक छोर पावो के एक हिस्से को जोड़ता है तो दूसरा जयहरीखालएसतपुलीएबीरोखालए एकेश्वरए पोखड़ा और द्वारीखाल तक फैला है। 2002 और 2007 में बीरोखाल विधानसभा थी। इस सीट पर महाराज की पत्नी अमृता रावत विधायक रहीं। महाराज समर्थक अमृता राज में कराए गए कार्यों का वास्ता देने से भी नहीं चूक रहे। साथ ही बाहरी का दांव भी चल रहे हैं। वे राजपाल को बाहरी साबित करने पर तुले हैं। मैदान में उतरे बाकी प्रत्याशी भी इसे मुद्दा बना रहे हैं।
मगर महाराज समर्थक उनसे दो हाथ आगे इसलिए हैं क्योंकि वे महाराज के स्थानीय होने के पक्ष में दो तर्क दे रहे हैं। पहला यह कि उनका घर धैड़ चुनाव क्षेत्र के पोखड़ा में है और दूसरा यह कि उनकी पत्नी अमृता मायका रिंगवाड़ी एकेश्वर में है। लेकिन चुनाव क्षेत्र की रुत कहीं कांग्रेसी है तो कहीं भाजपाई। कस्बों और चौराहों पर हावी भगवा पताकाओं के जवाब में राज समर्थकों का एक ही जवाब है कि ये जंग धनबली और जनबली के बीच है। गजब यह है कि चुनावी मुद्दे हाशिये पर हैं। बड़े फलक के नेता महाराज के मुद्दे चौबट्टाखाल की सीमाओं को लांघ रहे हैं।
उनके प्रोटीन क्त्रसंतिए मेडिकल हब सरीखे शब्दों में जो राज छुपा हैए उसका जनसंपर्कों में समर्थक खुलासा कर रहे हैं। लेकिन महाराज और राज के मध्य एक तीसरा कोण कवींद्र ईष्टवाल भी हैंए जिसे लेकर भाजपा आशंकित हैं। कवींद्र भाजपा से बगावत कर समर में उतरे हैं। उन्हें मनाने के सारे जतन नाकाम रहे। चुनावी हवाओं में ये चर्चा गर्म है कि कवींद्र की मौजूदगी महाराज की राह में मुश्किल पैदा कर सकती है। इसलिए महाराज हर दांव चल रहे हैं। वह बीरोंखाल स्यूंसी में नितिन गडकरी की चुनावी सभा करा चुके हैं। युवा मन में कौंध रही मोदी लहर का भी उन्हें पूरा आसरा है। पिछला चुनाव करीबी अंतर से हारे राजपाल अपने बूथ मैनेजमेंट और सक्त्रिस्यता के भरोसे चुनावी राह बनाने में जुटे हैं। दिग्गजों की इस भीषण जंग में जनता के बीच पसरा सन्नाटा अवसरवाद की राजनीति की आइना दिखा रहा है।