इंटरनेट की काली दुनिया कहे जाने वाले डार्क वेब के रहस्यों को सुलझाने के लिए पुलिस ने आईआईटी रुड़की से हाथ मिलाया है। संस्थान के विशेषज्ञों के साथ मिलकर एसटीएफ और साइबर थाना पुलिस ने इस पर काम शुरू कर दिया है। बताया जा रहा है, जल्द एसटीएफ डार्क वेब के कुछ रहस्यों को सुलझाकर बड़े खुलासे कर सकती है। इसके लिए एक विशेष टीम भी बनाई गई है।
साइबर क्राइम पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है। अभी तक सामान्य इंटरनेट पर होने वाले अपराधों से ही पुलिस दो-चार हो रही है। अब बड़ी चुनौती डार्क वेब है। यहां लोगों की व्यक्तिगत जानकारियों की बोली लगाई जाती है। दुनिया का लगभग हर अवैध धंधा अब डार्क वेब के माध्यम से हो रहा है। पुलिस के पास जो संसाधन और जानकारियां हैं उनसे डार्क वेब को नहीं समझा जा सकता है। ऐसे में अब आईआईटी के विशेषज्ञों की एक टीम के साथ एसटीएफ ने अपने अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किया है।
अधिकारियों के मुताबिक, डार्क वेब से इन दिनों ड्रग डीलिंग के साथ-साथ हथियारों की खरीद-फरोख्त भी होती है। सामान्य दिखने वाले क्रिप्टो करेंसी का अब डार्क वेब के जरिये हवाला के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है।एसटीएफ के अनुसार, डार्क वेब पर ऐसी लाखों वेबसाइट, सर्वर आदि होते हैं जिन्हें पकड़ा नहीं जा सकता। यह अमेरिका जैसे विकसित और तकनीकी रूप से समृद्ध देश की पुलिस के लिए भी चुनौती भरा है।
जानिए... क्या है डार्क वेब
एसटीएफ के एसएसपी आयुष अग्रवाल ने बताया कि डार्क वेब इंटरनेट का वो हिस्सा है, जहां वैध और अवैध दोनों तरीके के काम होते हैं। इंटरनेट का 96 फीसद हिस्सा डीप वेब और डार्क वेब के अंदर आता है। हम इंटरनेट कंटेंट के केवल चार प्रतिशत हिस्से का इस्तेमाल करते है। इसे सरफेस वेब कहा जाता है। डीप वेब पर मौजूद कंटेंट को एक्सेस करने के लिए पासवर्ड की जरूरत होती है। इसमें ई-मेल, नेट बैंकिंग आते हैं। डार्क वेब को खोलने के लिए टॉर ब्राउजर का इस्तेमाल किया जाता है। डार्क वेब पर ड्रग्स, हथियार, पासवर्ड, चाइल्ड पोर्न जैसी बैन चीजें मिलती हैं।
ऐसे करता है काम
डार्क वेब ओनियन राउटिंग टेक्नोलॉजी पर काम करता है। ये यूजर्स को ट्रैकिंग और सर्विलांस से बचाता है और उनकी गोपनीयता बरकरार रखने के लिए सैकड़ों जगह रूट और री-रूट करता है। आसान शब्दों में कहा जाए तो डार्क वेब ढेर सारी आईपी एड्रेस से कनेक्ट और डिस्कनेक्ट होता है। इनसे इसको ट्रैक कर पाना असंभव हो जाता है। यहां यूजर की इन्फॉर्मेशन इंक्रिप्टेड होती है जिसे डिकोड करना नामुमकिन है। यहां डील करने के लिए वर्चुअल करेंसी जैसे बिटकॉइन का इस्तेमाल होता है ताकि ट्रांजेक्शन को ट्रेस न किया जा सके।
इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में कर्मचारियों और अधिकारियों को पहले डार्क वेब के बारे में समझाया जा रहा है। इसके बाद अपराध के खुलासे की तकनीक भी बताई जाएगी। यह प्रोग्राम करीब दो महीने से चल रहा है। कई मामलों को लेकर पड़ताल भी की जा रही है।
-आयुष अग्रावल, एसएसपी एसटीएफ