इस पर 84 वर्ष के दीवान सिंह हों या 22 वर्ष की वैशाली गर्ब्याल, प्रोफेसर संदेशा रायपा गर्ब्याल हों या यहां के व्यापारी, सभी विभिन्न माध्यमों से भाषा को बचाने की कोशिश में लग गए। इन्होंने सोशल मीडिया का भी उपयोग किया।
व्हाट्सएप ग्रुप बनाया, पत्रिका भी निकाली गई। बताया कि बोली को बचाने के लिए तमाम कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। सामाजिक संस्थाओं की भी मदद ली गई। प्रधानमंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने 2019 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ इंडीजिनियस लैंग्वेजेस के रूप में मनाया जा रहा है।
इसके तहत ऐसी भाषाओं को संरक्षित किया जा रहा है, जो विलुप्त हो रही हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि रं समाज की यह पहल पूरी दुनिया को राह दिखने वाली है। उन्होंने कहा कि धारचूला की कहानी पढ़कर काफी संतोष मिला सभी लोगों से अपनी भाषा बोली का उपयोग करने की अपील भी की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में धारचूला में आने-जाने के दौरान रुकने की बात का जिक्र किया उससे उनका पिथौरागढ़ के प्रति लगाव साफ नजर आया। उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव नृपसिंह नपलच्याल के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले कैलाश यात्रा पर गए थे।
उस समय वे नारायण आश्रम में भी रुके। मन की बात में रं समाज का जिक्र होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी की काली नदी के किनारे खींची गई वर्षों पुरानी कुछ तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर शेयर की गई।
गदगद हुए रं समाज के लोग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मन की बात में बोली भाषा के संरक्षण को लेकर प्रशंसा करने से रं समाज के लोग खुश नजर आए। रविवार को जब रं समाज के लोगों ने प्रधानमंत्री के मन की बात सुनीं तो चीन और नेपाल सीमा पर रहने वाले रं समाज के लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
सीमांत के दारमा, व्यास और चौंदास में रं समुदाय के लोगों की अपनी बोली है। स्थानीय लोगों के अनुसार महाभारत काल से ही रं समाज के लोग अपनी रं बोली में बातचीत करते हैं। यह भाषा चीनी, तिब्बती और नेपाली भाषा से पूरी तरह भिन्न है।
रं कल्याण संस्था के धारचूला इकाई के अध्यक्ष कृष्णा गर्ब्याल का कहना है कि यह हमारे पूर्वजों की दूरदृष्टि और अपनी संस्कृति के प्रति समर्पण ही था कि विभिन्न प्रकार के संस्कारों, विवाह आदि में रं भाषा का प्रयोग आवश्यक कर दिया। इसी कारण रंल्वो को जानना नई पीढ़ी के लिए भी आवश्यक होता है। आज भी यह भाषा मूलरूप में विद्यमान है।
अध्यक्ष ने कहा कि अपनी भाषा को बचाने के लिए समारोह में आवश्यक रूप से रं भाषा बोली जाती है। संचालन भी अपनी भाषा में किया जाता है। संस्कृति के संरक्षण के लिए हर तीसरे साल रं महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
संस्था के महासचिव राम सिंह ह्यांकी, उपाध्यक्ष भागीरथी ह्यांकी आदि ने कहा कि प्रधानमंत्री की मन की बात से लोगों का उत्साह दो गुना हो गया है। अब सभी दुगुने उत्साह से अपनी बोली भाषा के संरक्षण और प्रचार प्रसार का काम करेंगे।