रीच संस्था के पांच दिवसीय थिएटर फेस्ट के तीसरे दिन नाटक ‘मय्यत’ की प्रस्तुति ने जातिवादी व्यवस्था पर सवाल उठाए। ओएनजीसी स्थित एएमएन घोष ऑडिटोरियम में ऊषा गांगुली निर्देशित नाटक में औरंगाबाद नामक गांव की कहानी पेश की गई। गांव में हर साल भगवान की पालकी यात्रा निकाली जाती है, लेकिन लंबी पैदल यात्रा से बचने के लिए ब्राह्मण चार दलितों को चुनकर ब्राह्मण का दर्जा दे देते हैं।
मौका मिलने का इंतजार करता है
गांव का लक्खू वर्षों तक यह मौका मिलने का इंतजार करता है। उसे लगता है कि भगवान की पालकी छूकर उसका बीमार बेटा ठीक हो जाएगा। लक्खू अपने तीन साथियों संग पालकी लेकर निकलता है। लेकिन दुर्बल और रोगी शरीर साथ नहीं देता। बीच रास्ते में लक्खू की मौत हो जाती है।
इसके बाद उसके अंतिम संस्कार पर झगड़ा शुरू हो जाता है। दलित कहते हैं कि लक्खू जिस दिन मरा, उस दिन वह ब्राह्मण था लिहाजा ब्राह्मण यह जिम्मा निभाएं।
छोड़ देती हैं बिरादरियां
दूसरी ओर, ब्राह्मण उसे दलित बताकर इंकार कर देते हैं। आखिर दोनों ही बिरादरियां लाश छोड़ देती हैं। लक्खू का बीमार बेटा जैसे-तैसे पिता के मृत शरीर को खींचकर ले जाने का प्रयास करता है, लेकिन नाकाम रहता है। आखिर वह शव छोड़ रोने लगता है। इसके बाद ‘वामा’ नाटक की भी प्रस्तुति दी गई। नाटक में खुद ऊषा गांगुली ने भी अभिनय किया।
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