मंदिर समिति के अनुसार वर्ष 2016 में 25 नवंबर से 31 दिसंबर तक ओंकारेश्वर मंदिर में 7110 श्रद्धालुओं ने शीतकाल में दर्शन किए थे, जिसमें 6730 श्रद्धालु ऐसे हैं जो 25 नवंबर 2016 को द्वितीय केदार की डोली के आगमन पर मौजूद थे।
पंचकेदार शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में बीते 25 नवंबर के बाद से 16 जनवरी तक 4394 श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। यह संख्या बीते वर्ष की तुलना में दोगुनी है, बावजूद यहां श्रद्धालुओं के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं जुट पाई हैं।
भगवान बदरीनाथ के शीतकालीन पूजा स्थल पांडुकेश्वर और जोशीमठ में एक माह में मात्र 2136 तीर्थयात्री ही दर्शन को पहुंचे हैं। इनमें 1755 जोशीमठ और 381 यात्री पांडुकेश्वर पहुंचे हैं। इनमें ऐसे पर्यटकों की संख्या अधिक है, जो पर्यटन स्थलों के साथ ही देवालयों में भी पहुंच रहे हैं।
बदरीनाथ धाम की शीतकालीन पूजा योग ध्यान बदरी मंदिर पांडुकेश्वर और जोशीमठ में होती है। बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने पर बदरीनाथ के प्रतिनिधि के रुप में उद्धव जी और कुबेर जी शीतकाल के लिए योग ध्यान बदरी मंदिर पांडुकेश्वर में प्रतिष्ठापित होते हैं, जबकि आदि गुरु शंकराचार्य की गद्दी जोशीमठ नृसिंह मंदिर में विराजमान होती है।a
पांडुकेश्वर पांडवों की जन्मस्थली भी है। कहा जाता है कि आदिकाल में जब किन्नम नामक ऋषि मृग का रूप धारण कर घास खा रहे थे तो इसी दौरान राजा पांडु ने उनका वध कर दिया था। तब ऋषि ने पांडु को उनकी वंश वृद्धि न होने का श्राप दे दिया था।
श्राप से मुक्ति पाने के लिए पांडु अपनी दोनों पत्नियों कुंती और माद्री के साथ हिमालय क्षेत्र में पहुंचे। यहां उन्होंने कई वर्षों तक तपस्या की। माता कुंती को दुर्वासा ऋषि ने किसी भी देवता से संतान प्राप्ति का वरदान दिया था। इसके बाद कुंती और माद्री को भगवान विष्णु से सत्यवादी, पवन देव से पहलवान, इंद्रदेव से धनुर्धर व अश्विन और कुमार देव से पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। तभी से इस स्थान का नाम पांडुकेश्वर पड़ा।
गंगोत्री धाम के कपाट बंद होने के बाद मां गंगा अपने शीतकालीन पड़ाव मुखबा में विराजमान हैं। मुखबा गांव में मां गंगा का मायका है, जहां वह हर साल शीतकाल में आती हैं। यहां वे अपने मंदिर में विराजमान होती हैं। मुखबा गांव के तीर्थ पुरोहित छह माह तक यहां मां गंगा की पूजा अर्चना करते हैं। ऋषिकेश से उत्तरकाशी होते हुए धराली तक सड़क मार्ग से 250 किमी दूरी और धराली से एक किमी पैदल दूरी तय कर यात्री मुखबा पहुंच सकते हैं।
देहरादून से सड़क दूरी 220 किमी है। गंगा के शीतकालीन प्रवास स्थल मुखबा में मां गंगा की भोगमूर्ति के दर्शन एवं पूजा की व्यवस्था है, जबकि देहरादून से नैनबाग, बड़कोट होते हुए खरसाली की दूरी 170 किमी है। यमुना के शीतकालीन प्रवास खरसाली में मां यमुना की उत्सव मूर्ति के दर्शन एवं पूजा की व्यवस्था के साथ ही पूरा गांव आबाद है।
पंचकेदारों में चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ की शीतकालीन पूजा गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर में होती हैं। यह स्थान ऋषिकेश से 212 किलोमीटर की दूरी पर है। गोपीनाथ मंदिर गोपेश्वर नगर के मध्य में स्थित है। शीतकाल में भी गोपेश्वर का मौसम सामान्य रहता है।
तीर्थयात्री गोपीनाथ और रुद्रनाथ के दर्शन एक साथ कर सकते हैं। पर्यटन के लिहाज से भी गोपेश्वर बेहतर स्थान है। यहां आठवीं सदी में निर्मित गोपीनाथ मंदिर स्थित है। यह मंदिर कत्यूरी शैली में बनाया गया है। मंदिर प्रांगण में शिव का प्राचीन त्रिशूल दर्शनीय है। इसी के साथ यहां वैतरणी मंदिर समूह, चामुंडा मंदिर, सकलेश्वर महादेव और बटलेश्वर मंदिर भी दर्शनीय हैं।
यमुनोत्री धाम के कपाट होने के बाद मां यमुना खरसाली स्थित मां राजराजेश्वरी मंदिर में विराजमान हैं। खरसाली मां यमुना का मायका है। यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने तक यहीं उनकी पूजा-अर्चना हो रही है। मान्यता है कि अनादिकाल में गोलोक से मां यमुना कलिंद पर्वत पर अवतरित हुई थीं। कलिंद पर्वत से यमुनोत्री तक मां यमुना को कालिंदी के नाम से जाना जाता है, जबकि यमुनोत्री के बाद मां को जमुना नाम से भी जाना जाता है।
यमुनोत्री में जय मुनि ऋषि ने मां यमुना की आराधना की थी। तब से मां यमुना यमुनोत्री में छह माह रहती हैं। खरसाली भगवान शनि की जन्म स्थली है। कहा जाता है कि भगवान सूर्य की दो पत्नियां थी संज्ञा और छाया। पहली पत्नी संज्ञा से यमराज व यमुना और दूसरी पत्नी छाया से शनिदेव का जन्म हुआ है। यमुना, यमराज और शनिदेव भाई बहन हैं। खरसाली में शनिदेव का जन्म हुआ है, इसलिए मां यमुना हर साल छह माह यमुनोत्री के कपाट बंद होने पर अपने मायके खरसाली आती हैं। खरसाली को खुशीमठ नाम से भी जाना जाता है।