उत्तराखंड में कुछ फार्मास्युटिकल्स कंपनियां दवा बनाने वाले पदार्थों (सॉल्ट) को ‘जहर’ बनाने में इस्तेमाल कर रही हैं।
जीवन रक्षक दवाओं को नशीले पदार्थों में तब्दील करने वाली कंपनियों के इस काले कारोबार का टारगेट युवा हैं। युवा पीढ़ी जानलेवा नशे की गिरफ्त में जकड़ रही है।
नशे का कारोबार करने वाली कुछ कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है। कुछ नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के रडार पर हैं। इस काले कारोबार को कंट्रोल करने वाला ड्रग कंट्रोलर विभाग निहत्था है।
सेलाकुई, रुड़की और हरिद्वार की कुछ कंपनियों के खिलाफ पिछले दो सालों में कार्रवाई हो चुकी है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो कई कंपनियों के खिलाफ छानबीन कर रहा है। युवाओं को ऐसे सॉल्ट का नशेड़ी बनाया जा रहा है, जो जुकाम, खांसी, दर्द, अनिद्रा, उलझन, घबराहट जैसी आम दिक्कतों के काम आते हैं।
ड्रग कंट्रोलर विभाग स्टाफ की कमी के कारण स्थिति से निपट नहीं पा रहा है। सामान्य निरीक्षण के अलावा इस काले कारोबार को रोकने के लिए ड्रग कंट्रोलर विभाग कोई सख्त कदम नहीं उठा पा रहा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अधीक्षक रवि कुमार राणा का कहना है कि पिछले दिनों कुछ कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। कुछ के खिलाफ छानबीन चल रही है।
फार्मास्युटिकल्स कंपनियों की स्थिति
देहरादून (सेलाकुई)- 63
हरिद्वार (रुड़की)- 185
पौड़ी- 3
नैनीताल- 7
अल्मोड़ा- 1
कुल सॉल्ट-70
प्रतिबंधित सॉल्ट:
अफीम, कोडीन, थिवेन, डाइएथिललाइसरजैमाईड, टीएचसी, मेथेमफेटामिन, मेथाक्वेलोन, एम्फटेमिन समेत 17 सॉल्ट। इनमें अधिक सॉल्ट जीवन रक्षक हैं। कैंसर, सर्जरी और गंभीर बीमारियों में इन सॉल्ट का इस्तेमाल होता है।
ये भी आए नारकोटिक्स के दायरे में
एल्प्राजोलम, डाइजापाम, क्लेनेक्साजोलाम, सियूडो इफेड्रीन, इफेड्रीन, एसेटिक एनेडाइड्राई समेत 10 सॉल्ट। इन सॉल्ट का इस्तेमाल सर्दी, खांसी, दर्द नाशक, घबराहट, बेचैनी, हाइपरटेंशन की दवाओं में किया जाता है।
इन पर हुई कार्रवाई
सेनेटिव फार्मास्युटिकल्स, वैष्णव रिमेडी और डेनवर्क के खिलाफ हो चुकी है कार्रवाई। ड्रग कंट्रोलर कार्यालय के लाइसेंसिंग अथॉरिटी ताजवर सिंह का कहना है कि इस वक्त कंपनियां बंद हैं।