आपने देहरादून की लगातार उखड़ती-बनती सड़कों को देखा होगा। लेकिन दून के पेट्रोलियम विश्वविद्यालय (आईआईपी) ने ऐसी तकनीकी ईजाद की है जिससे सड़क ऐसी पक्की और मजबूत बनती है कि वह आसानी से नहीं टूटती।
तकनीकी का नाम थोड़ा दुरूह जरूर है (प्रोसेस टेक्नोलॉजी पॉलिमर मॉडीफाइड बिटुमिंस बाइंडर्स) मगर उससे बनी सड़क को देखकर आपके मन में बस यही ख्याल आ सकता है ...आखिर ये सड़क टूटती क्यों नहीं।
खास तौर पर तब, जबकि पीडब्लूडी जैसे सड़कों के लिए जिम्मेदार विभागों की बनाई सड़कें बारिश का एक सीजन मुश्किल से झेल पाती हैं। मजबूती के मद्देनजर नेशनल हाइवे अथारिटी ऑफ इंडिया (एनएचआई) तक एनएच-7, एनएच-1 पर इस तकनीक का प्रयोग कर रहा है।
लेकिन इसे विडंबना ही कहेंगे कि टूटी सड़कों ले परेशान अपना उत्तराखंड में ही यह तकनीकी नहीं अपनाई जा रही। कुछ लोग इसके पीछे कमीशन का खेल का भी आरोप लगाते हैं।
...इसलिए ईजाद की थी यह तकनीकी
भारतीय पेट्रोलियम संस्थान का अपनी प्रोसेस टेक्नोलॉजी से सड़क बनाने का मकसद देश में मार्ग निर्माण की भविष्य की जरूरत के मद्देनजर हाई परफार्मेंस बिटुमिंस बाइंडर्स विकसित करना था। आईआईपी के वैज्ञानिकों की देख-रेख में उसकी तकनीक से पीडब्लूडी ने सड़क का निर्माण किया था।
यहां बनी है यह डेढ़ किलोमीटर की सड़क
2007 में दिल्ली-यमुनोत्री मार्ग पर हरबर्टपुर में 223-224 किलोमीटर पर एक तकरीबन डेढ़ किलोमीटर (1075 मीटर) की सड़क बनाई गई थी।
वैज्ञानिकों की गारंटी थी कि यह तकनीकी से सड़क 10 साल तो चलेगी ही। यह सच भी हुआ। गर्मी और बारिश के सात सीजन झेलने के बावजूद इस पर कहीं दरार नहीं है।
एक किलोमीटर पर एक लाख की बचत
पीडब्लूडी के विशेषज्ञों की मानें तो एक किलोमीटर की इकहरी (सिंगल लेन) सड़क के निर्माण में 14-15 लाख रुपए की लागत आती है। पॉलिमर मॉडीफाइड बिटुमिन बाइंडर्स का प्रयोग कर इसमें तकरीबन एक लाख तक की बचत की जा सकती है।
यह खूबियां भी
1. रद्दी हो चुके रबर टायर का प्रयोग किया जाता है, इसलिए लागत परंपरागत बिटुमिन की तुलना में 20-30 प्रतिशत कम है।
2. इलास्टोमर्स : स्टाइरिन-बुटाडाइन-स्टाइरिन (एसबीएस), प्लास्टोमर एथिलीबुटिल-एक्रिलेट (ईबीए) और क्रंब रबर का प्रयोग किया गया, जो कि बाजार में आसानी से उपलब्ध है।
3. सड़क सामग्री मिश्रण (होमोजिनाइजिंग) यूनिट के अलावा अलग से किसी इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं पड़ती।
आईआईपी ने यह तकनीक इसलिए ईजाद की थी ताकि सड़कों पर लागत कम आए और वह मजबूत बन सकें, लेकिन ट्रैक ट्रायल कामयाब होने के बावजूद संस्थान को पीडब्लूडी ने तकनीक के लिए संपर्क नहीं किया है।
- डॉ. मनोज श्रीवास्तव, वरिष्ठ वैज्ञानिक, आईआईपी
यह ठीक है कि मॉडिफाइड बिटुमिंस बाइंडर्स से बनी सड़क मजबूत रहती है, लेकिन स्टेट हाइवे में इसे नहीं अपनाया गया है। यहां इसकी बहुत जरूरत भी नहीं। मॉडीफाइड पालिमर्स की उपलब्धता भी कम है। एनएच इससे बन रहे हैं, यह अलग बात है।
- हरिओम शर्मा, प्रमुख अभियंता, पीडब्लूडी